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________________ जैनविद्या - 19 जिसमें अल्प बहुत्व (comparability) की आधुनिक पद्धति जिनागम पद्धति से पूर्ण मेल खाती है। 3. गोम्मटसार एवं लब्धिसार आदि (आधुनिक प्रसंग में) __जहाँ त्रिलोकसार द्वारा श्री नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने कर्म सिद्धान्त में प्रयुक्त होनेवाले लोकोत्तर गणित को आधार रूप स्थापित किया, वहाँ गोम्मटसार ग्रन्थ में अनेक प्रकार के कर्म से निर्मित जीवस्थानों में मार्गणास्थान, गुणस्थान, जीव-समास में पाई जानेवाली जीवराशियों का अनेक प्रकार से विवेचन देकर कर्म सिद्धान्त की नींव डाली। जीवकाण्ड में विशेष रूप से जीव में विशुद्धि से फलित होनेवाले अधःप्रवृत, अपूर्व एवं अनिवृत्ति करणों के गणितों को अंकसंदृष्टियों एक अर्थ-संदृष्टियों द्वारा प्रतिबुद्ध किये जाने हेतु टीकाकारों का मार्ग प्रशस्त किया। ___ यहीं से राशि सिद्धान्तमय गणित प्रकट होता है। आज की system Theory में जो कुछ भी गणित का प्रयोग हुआ है वह अखिल विश्व में आजतक की प्रायः सभी गणितों का एक साथ उपयोगरूप है। कर्म सिद्धान्त वस्तुतः System theory अथवा प्रणाली सिद्धान्त है जो जटिलतम प्रणाली रूप में जैनाचार्यों ने पूर्वो के इस ज्ञान में गणित द्वारा राशियों के पारस्परिक सम्बन्ध स्थापित करते हुए प्रस्तुत किया। इस कर्म सिद्धान्त में गणित की विभिन्न राशि सम्बन्धी कलन की विशेषता होने से सामूहिक रूप को सम्हालनेवाला गणित लगता है ताकि गुणस्थानों में हुए करण आदि परिणामों से फलित होनेवाले कर्म matrices या आब्यूहों या यंत्रों को दिग्दर्शित किया जा सके। स्पष्ट है कि मात्र शब्दों द्वारा न तो कम जगह में गणितीय न्यास रखा जा सकता है, न ही गणितीय प्रक्रियाओं से उत्पन्न विधियों को दर्शाया जा सकता है। अतः सूत्रबद्ध प्ररूपणा की टीकाओं में सर्वप्रथम ही गणित में प्रयुक्त होनेवाली सभी राशियों, प्रक्रियाओं आदि के लिए अर्थ-संदृष्टि, उससे सरल अंक-संदृष्टि तथा उससे भी सरल आकार रूप संदृष्टियाँ विकसित की गईं। आधुनिक विधियाँ यंत्रों (matrices) के क्षेत्र में बहुत आगे निकल चुकी हैं क्योंकि वे राशि अथवा समूह के समूह को गुच्छ रूप लेकर चलती हैं तथा प्रतिक्रियाओं से उत्पन्न हुए फलों को यंत्रों अथवा टेन्सरों द्वारा अत्यन्त संक्षित रूप में विशालतम प्रक्रियाओं को बतलाते हुए थोड़ी सी जगह में अत्यंत जटिल ज्ञान को सरलता से प्रस्तुत कर देती हैं । अतः गोम्मटसार में पाये जानेवाले जीव सम्बन्धी न्यास (data) को (जो क्रमशः जीवकाण्ड में मात्र राशियों रूप और कर्मकाण्ड में स्थिर समय रूप बंध, उदय, सत्त्व प्रकृतियों या कर्म स्थिति रचना रूप उपलब्ध है) कम्प्युटर में प्रोलाग भाषा में रखना होता है । टूरबो सी प्लस-प्लस में भी यह कार्य हो सकता है। किन्तु जब लब्धिसार का गतिशील समीकरण मय-विषय आता है, उसमें प्रकृति के साथ अनुभाग, स्थिति और प्रदेशों की बदलती हुई राशियाँ दिखाना एक कठिन कार्य हो जाता है। इस हेतु हमें artificial intelligence (कृत्रिम बुद्धि) कम्प्यू टर में भरने की आवश्यकता होती है, जैसी मेडिकल डायग्नोसिस, एक्सपर्ट सिस्टम या रोबाट बनाने में प्रयुक्त होती है। इसमें सन्देह नहीं है कि कर्म सिद्धान्त जैसी System Theory को कम्प्यूटर द्वारा सुव्यवस्थित इस रूप में किया जा सकता है कि सभी प्रकार के वैज्ञानिक इस एकसूत्री सिद्धान्त से अपने-अपने अध्ययन के क्षेत्रों में लाभ ले सकें।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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