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जैनविद्या - 19
समयवर्ती होती है। अस्तु, सांसारिक या दैविक, नारकीय घटनाएँ चेतन या अचेतन में निजनिज कर्मानुसार या योग्यतानुसार घटित होती हैं । मात्र जीव में एक ऐसा पारिणामिक भाव जीवत्व, भव्यत्व या अभव्यत्व रूप होता है, जहाँ विशुद्धि की प्रधानता रहस्यमय प्रभाव देती दृष्टिगत होती है। राहु कोई देव नहीं अपितु विमान का नाम है। वे भी दिन राहु, पर्व राहु, ऋतु राहु रूप में चन्द्रकलाच्छादन, ग्रहण, संवत्सरादि के कलन में उपयुक्त होते हैं।
असंख्यात द्वीप समुद्र क्या है, उनके दिग्दर्शन का अभिप्राय क्या है? एक तो लोक की सीमा और उसमें करोड़ों ज्योतिर्बिम्बों का स्थिर एवं अस्थिर व्यवस्था के अभिप्राय से इतने द्वीप समुद्रों का एक समतल में फैलाव बतलाया गया है। अढ़ाई द्वीप तक, मानुषोत्तर पर्वत के इस ओर तक विभिन्न रचनाओं से मानस-लोक है जिसके आगे मनुष्य का जाना सम्भव नहीं था। द्वीप और समुद्र ठीक वृत्ताकार किस तथ्य के द्योतक हैं? इन सभी बातों से प्रतीत होता है कि विस्तृत क्षैतिज समतल में विभाजन की योजना हुई और वृत्ताकार क्षैतिजरूप में द्वीप समुद्रों के मण्डल से रज्जू के विस्तार को भरा गया जिसके द्वारा पल्योपम, सागरोपम नामक ऐसी काल-राशियाँ उत्पन्न की गईं जिनका सम्बंध कर्म स्थितियों को उपमा मान द्वारा प्रतिबोधित किया जा सके। - इसी प्रकार जम्बूद्वीप में ज्योतिषीय एवं भौगोलिक बोध भरा गया। आनुपातिक रूप से सुस्पष्ट स्थितियाँ, रचनाएं अंकित करने हेतु जम्बूद्वीप को एक लाख योजनवाला नियत किया गया। यहाँ भौगोलिक योजन को क्या 9 मील माना जाय या कुछ और कम? लिश्क और शर्मा ने 49820 अर्थात् (44820-5000) योजनों को सादृश्य के आधार पर पृथ्वी के गोल के 66° में मान्यता दी है। वहीं 510 योजनों को आत्मांगुल पद्धति में 48° की मान्यता दी है। इस प्रकार 66° चाप का मान 510/48 x 66 = 701'/, योजन आत्मागुल पद्धति में उत्सेधांगुल पद्धति के 1402'/, योजनों में परिवर्तित हो जाते हैं। इन्हीं का मान चीनी 'ली' माप में 1402'/, x 35 = 49087 माप होता है। यह माप 49820 के विशेष निकट है। उन्होंने तदनुसार भौगोलिक योजन को पृथ्वी पर 6'/, मील के लगभग मानकर 701'/ योजन जम्बूद्वीप की त्रिज्या को पृथ्वी की त्रिज्या, जो 4000 मील के लगभग है, ला दिया है। इसी के आधार पर ज्योतिष बिम्बों की चित्रा पृथ्वी तल से ऊँचाइयाँ कोणीय माप में बहुत कुछ सही आ जाती हैं जो आधुनिक वैज्ञानिक मान हैं।'
त्रिलोकसार में वर्णित श्रेणिसंकलन मुख्यतः समान्तर श्रेणि तथा गुणोत्तर श्रेणि सम्बन्धी है जिनका उपयोग विभिन्न रूप से निर्मित नारकी अथवा देवों के निवासों की संख्या के संकलन में किया गया है। जटिल श्रेणि संकलन के रूप में ज्योतिर्बिम्बों की कुल संख्या लोक में प्राप्त करना रहा है। इसी प्रकार श्रेणि संकलन का प्रयोग द्वीप-समुद्रों के अंतः मध्य, बाह्य व्यास, जम्बूद्वीप के क्षेत्रफल से अन्य द्वीप समुद्रों के क्षेत्रफलों की तुलना अथवा अनेक प्रकार के इनसे सम्बन्धित संकलन में हुआ है । इस प्रकार संख्या मान एवं उपमा मान में क्रमशः विभिन्न इकाइयाँ स्थापित कर विभिन्न प्रकार राशियों का बोध प्रमाण विषयक कराया जाना द्रव्य प्रमाण, क्षेत्रप्रमाण, कालप्रमाण तथा भावप्रमाण द्वारा व्यवस्थित किया गया है। सत्तात्मक राशियों के प्रमाण का इन रचनात्मक राशियों द्वारा बोध कराना आधुनिक राशि सिद्धान्त का भी विषय बनता जा रहा है।