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________________ जैनविद्या 19 की चरम सीमाओं तक पहुँचा। अरस्तू (ई.पू. 384 ) ने तर्क वाक्यों का सिद्धान्त बनाया और गणित-विज्ञान की नींव प्लेतान (ई.पू. 427 ) ने डाली। यूडो (ई.पू. 370 ) ने पृथ्वी की गोलाई छाया-माप के आधार पर डाली, वहीं जिनागम में भी छाया - मापादि के आधार पर योजन, ग्रहादिगमन गति, युग पद्धति, गगनखंडादि गणनाएँ आईं तथा चीन में भी 'ली' के आधार पर यिनयेंगादि सिद्धान्त आगे बढ़े। टालेमी (ई.पू. दूसरी सदी) ने ग्रहों के गमन को वृत्त गुच्छों (epicycle) द्वारा समझाया और डायोफ़ेन्ट्स ( 275 ए.डी.) ने यांत्रिकी तथा उदस्थैतिकी नींव डाली वहीं तिलोयपणती आदि ग्रन्थों में पातालादि के सिद्धान्तों द्वारा समुद्र के ज्वार भाटादि का कारण बतलाया गया । वहीं चीन में लगभग इसी समय समुद्री प्राणियों का फूलना और संकुचन बतलाया गया। इस प्रकार लगातार विज्ञान तथा मनोविज्ञान दैवी - दायरों को तोड़कर यंत्र विज्ञान द्वारा सभी को कारणताओं पर ढालता चला गया। चीन में कन्फ्यूशस, लाओत्ज़े आदि भी दार्शनिक पक्षों को वैज्ञानिक रूप देते चले आये। आकाशीयपिंडों का गहन अध्ययन हुआ, नये सिद्धान्त बने तथा पंचांगों में जैन पंचांगों की भाँति सुधार हुए। 60 न्यूटन (1642 ई.) ने विज्ञान - जगत् में अभूतपूर्व कार्य कर गति-संबंधी नियमों को गुरुत्वाकर्षणादि आधार दिया, खगोलीय पिंडों के बीच दूरियाँ निकालीं किन्तु अनेक विद्युच्चुम्बकीय घटनाओं को न समझाया जा सका । भौतिक कारणता के दूसरे पक्ष में मैक्सवेल, लारेन्ज, आइन्स्टाइन, प्लांक आदि द्वारा स्थूलतम एवं सूक्ष्मतम संरचनाओं में आविष्कृत कर प्रयुक्त किये गये। इस प्रकार आज के वैज्ञानिकों ने भौतिक घटनाओं को गुरुत्वाकर्षण, विद्युच्चुम्बकीय एवं नाभिकीय शक्तियों के रहस्यों को उद्घाटित कर उनमें एकसूत्रीय सिद्धान्त में पिरोने का अद्भुत प्रयास किया किन्तु आंशिक सफलता को प्राप्त कर सके । जीवशास्त्र में भी डी.एन.ए.- आर.एन.ए. आदि जीवोत्पत्ति साधन सिद्धान्त आगे बढ़े, किन्तु भौतिक शक्तियों . के साथ एकसूत्री सिद्धान्त में न पिरोये जा सके हैं। वहीं जिनागम के कर्म सिद्धान्त (करण अनुयोग सिद्धान्त पर त्रिलोकसारादि ग्रन्थों में वर्णित हो) एकसूत्री सिद्धान्त की रचना को उद्घोषित कर प्रयोगों की चुनौती प्रस्तुत कर रहे हैं ।' लोक (विश्व) कितना विशाल है - किसी नीहारिका का प्रकाश (1 सेकंड में 18600 मील प्रति सेकण्ड की गति से) हमारे पास पहुँचने में 5 करोड़ वर्ष तक लग जाते हैं और वैज्ञानिकों को संदेह है कि क्या वे हमसे लगभग 4500 मील प्रति सेकण्ड की गति से दूर होती जा रही हैं ? यद्यपि आइंस्टाइन ने प्रकाश के वेग को लोक में महत्तम ही माना है। किन्तु टेक्ख्यान कणों की कल्पना इनसे भी तेज मानी गई है, किन्तु जिनागम में भी लोक परिमिति में माना गया है। अतः किसी भी कणादि को महत्तम गति से अधिक का निषेध है, इसी प्रकार लघुतम गति से भी लघुतर का निषेध है क्यों ? परमाणु, प्रदेश तथा समय, सभी सीमित हैं। नियंत्रण योग्यता विज्ञान से अमेरिका अपोलोयान 1969 में चंन्द्रतल तक मानवों को ले गया, जिसमें 2,50,000 लाख डालर तथा अन्य मद में 30,000 लाख डालर खर्च हुआ था । ज्ञात हुआ कि चन्द्रतल की चट्टाने 370 करोड़ वर्ष पुरानी हैं और वह पृथ्वी का अंश नहीं है । अन्तरिक्ष की गहराइयों काली राजी की भांति एंटी मेटर, ब्लेक होल आदि भी हैं । यह सभी ज्ञान प्राप्त करने शोधकार्य जहाँ लाखों
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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