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________________ जैनविद्या - 19 2. त्रिलोकसार - आधुनिक प्रसंग में - त्रिलोकसार का विषय जानने से पूर्व आधुनिक खगोल विद्या की जानकारी आवश्यक है। खगोल शब्द कुछ ऐसे तथ्यों का द्योतक है जिनका सम्बन्ध अन्तरिक्ष की गहराइयों और विश्वसंरचना की इकाइयों से है । कोई भी वस्तु कहाँ स्थित है, कब से स्थित है, किस दशा में है, उसकी विगत दशा क्या थी, अनागत दशा क्या होगी और दशा परिवर्तन का कारण क्या है ये प्रश्न हर युग के विचारकों को सर्वप्रिय होते हैं और उनकी खोज -पिपासा कभी नहीं मिटती है। इन प्रश्नों को लेकर सबसे बड़ी क्रांति यूनान, भारत तथा चीन आदि प्राचीन सभ्यताओं के केन्द्रों पर दृष्टिगत होती है । इन केन्द्रों पर एक विचित्र उत्सुकता जागी कि विश्व की घटनाओं का सम्पादन कैसे होता है? क्या कोई कार्य या घटना अथवा क्रिया के पीछे दैवी, आधिदैविक शक्तियाँ होती हैं, जिन पर नियंत्रण करने के लिए उन्हें प्रसन्न करना होता है ? अथवा कोई देवादि के अप्रसन्न होने पर अनिष्टकारी घटनाएं होती हैं, जिन पर मानव का कोई नियंत्रण नहीं होता है ? 59 त्रिलोकसारादि द्वारा जैनधर्म में इस नियंत्रण - योग्यता का अध्ययन बड़ी गहराई से हुआ। सभी घटनाओं को जो पुद्गल (matter) से सम्बन्धित थी; उन्हें कारणता नियम (law of causation) के अन्तर्गत बांधा गया। पुद्गल और जीव के बीच भी यह नियम कर्म के अधीन एवं कुछ और भी स्वतंत्र भावों के अधीन बांधा गया। यह विश्व में अनेक केन्द्रों पर प्राप्य कारणता का नियम तभी सार्थक होता है जब विगत, वर्तमान और अनागत की तारतम्य घटनाओं के बीच के सम्बन्ध राशि रूपों में, परिमाण पुंज रूपों में तथा जटिल गणितीय कलन रूपों में ठीक-ठीक व्यवस्थित किया जाता है । यही सफलता का आधार रहा है। 1 जहाँ प्राचीन काल में अध्यात्म शक्ति द्वारा इंद्रियों और मन से परे, संवेदनाओं से परे ज्ञान का स्वरूप महर्षियों ने पा लिया था वहाँ आज का विज्ञान सूक्ष्म वीक्षण यंत्र, दूरवीक्षण यंत्र, राडार, लेसर, मेसर प्रक्षेपयंत्र, उपग्रह जो अणुशक्ति से संचालित होकर गाइजर काउन्टर या कम्प्यूटर्स. आदि गणक यंत्रों द्वारा विभिन्न अध्ययन से प्राप्त विशाल सामग्री प्रस्तुत कर रहा है। शोध के अभिलेख-संदेश कुछ ही क्षणों या सेकण्ड के करोड़वें भाग में विश्व के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचाये जा रहे हैं। आज की इस वैज्ञानिक चरम उन्नति का प्रारम्भ भगवान पार्श्वनाथ तथा वर्द्धमान महावीर काल की क्रांति से होता है जब यूनान में थेलीज (ई.पू. 600 ) ने "Know thy self" के साथ ग्रहण काल बतलाना प्रारम्भ किया, देवताओं की शक्ति के मतों को चुनौती दी। पिथेगोरस (ई.पू. 540) ने विश्व में जीवों की संख्या नियत बतलाकर चदुचंकमण (tetractys) से छूटने हेतु मांस भक्षण निषेधकर अहिंसा की प्रतिष्ठा में हरे पौधों को भोजन की वस्तु से मुक्त किया। जैनागम के अनुसार हर वस्तु और घटना को संख्या प्रमाणादि से सम्बन्धित किया, रेखागणित को स्वयंसिद्ध आदि से बांधकर संगीत में गणित का प्रवेश किया। सुकरात (ई.पू. 415) ने तर्क को आगमन विधि से पुष्ट किया तथा जीनो (ई.पू. 450 ) ने अनन्त एवं अनन्तांश विषयक विरोधाभासों को समय और आकाश की संरचनाओं में प्रस्तुत कर घटनाओं द्वारा गति का विश्लेषण किया। जहाँ देमोक्रितस (ई.पू. 410 ) ने परमाणुवाद को स्थापित किया, चीन में भी परमाणुवाद केवल भौतिकता तक ही सीमित रहा वहाँ जिनागम कर्म - परमाणुओं के गणित
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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