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जैनविद्या - 19 प्राणियों के आहार को छीन रहे हैं वहीं अध्यात्म शक्ति द्वारा उनका गहन परिचय प्राप्त किया जा सका था। सचमुच ही वैज्ञानिकों जड़ और चेतन की एनट्रापी में अन्तर पाया है।'
अध्यात्म शक्ति से अर्जित ज्ञान को त्रिलोकसार में समाविष्ट किया गया है। इस हेतु अनन्तानन्त आकाश के मध्य सीमित लोक स्थापित कर उसमें अन्य विभिन्न द्रव्यों को वैज्ञानिक रूप देकर समाविष्ट किया गया है। खगोल सम्बन्धी दूरियाँ राजूओं में परमाणु संबंधी दूरियाँ सूच्यंगुलादि के प्रदेशों द्वारा मापी गयी हैं। एक प्राण का मान 44462458/आवलिका प्राप्त किया गया है जो 2880/3773 सेकण्ड के लगभग है । एक आवलि में जघन्ययुक्त अंख्यात समय होते हैं, जिसकी संख्या की गणना की जा सकती है। उसी पर आधारित पल्यकाल के समयों की संख्या है, जिसका सम्बन्ध सूच्यंगुल के प्रदेश संख्या माप से निम्नलिखित है -
सूच्यंगुल प्रदेशसंख्या = पल्य के समयों की राशि में उसी राशि का उतने बार गुणन जितनी पल्य की अर्द्धच्छेद राशि होती है। ___ हो सकता है कि मंदतम गति की अवधारणा ध्रुवीकरण जैसी घटनाओं पर प्रकाश दे सकें। खगोल विषयक ज्ञान में जीव, पुद्गल, धर्म द्रव्य, अधर्म द्रव्य, काल द्रव्य एवं आकाश द्रव्य की सत्ता न्यायसंगत है और जीव, पुद्गल, काल तथा आकाश राशियाँ क्रमशः अनन्तगुणी रूप में 16, 16ख, 16 ख ख, 16 ख ख ख समय एवं प्रदेश रूप में न्यायसंगत सिद्ध की गई हैं। अवगाहन शक्ति के आधार पर पुद्गलादि की संरचनादि को तथा कर्म परमाणुमय संरचना को न्यायसंगत बनाया है। ___ इसी प्रकार अनेक प्रकार की राशियों का अल्पबहुत्व चौदह धाराओं के द्वारा स्थान एवं पद के स्थलविज्ञान (topology) द्वारा दर्शाया गया है। यह आधुनिक ज्यामिति का सबसे बड़ा आविष्कार है। जीव के भावों और कर्म परमाणुओं के समीकरण बनाने हेतु पुद्गल द्रव्यों में संख्येय, असंख्येय और औपचारिक अनन्त प्रदेशों के प्रचय होते हैं। भावों और संवादी कर्म परमाणुओं, काल और आकाश के खंडों में समय संख्या अथवा प्रदेश संख्यादि का अल्पबहुत्व दर्शाने ये धाराएँ बनाई गई हैं। एक समय में एक प्रदेश और उसी अविभागी समय में 14 राजू का अतिक्रमण मंदतम एवं तीव्रतम गति का द्योतक है।
त्रिलोकसार में लोक की सीमाएँ, उसके ज्यामितीय खण्ड, चारों ओर से वेष्टित पदार्थ, भौगोलिक, ज्योतिष आदि के विवरण भी गणित द्वारा दिये गये हैं। ऋतु, राहू, कर्क, मकर राशियाँ, मध्यप्रदेश, धाराएँ, शलाका गणन के सभी सिद्धान्त (logarithms) आदि नवीन विवरण हैं । लोक का आकार 'पुरुष', जो सर्व प्राणियों में सर्वाधिक विकसित अवस्था है - कमर पर हाथ रखे हुए पुरुष को चारों ओर घुमा देने पर शंकु -समच्छिन्नकों से रचित लोक दृष्टिगत होता है जो 343 घन राजू नहीं होता है । वीरसेनाचार्य ने गणितीय गणनाद्वारा उसका घनफल 343 घन राजू निश्चित करने हेतु उसे स्फान सदृश आकारवाला लोक निर्धारित किया। इसी लोक में ज्योतिर्लोक तथा भौगोलिक लोक को स्थापित करने में तीन प्रकार के अंगुलों का प्रयोग किया गया - आत्मांगुल, उत्सेधांगुल और प्रमाणांगुल, जहाँ छायामाप और ग्रह-गमनादि रेखीय एवं कोणीय माप लगते थे और यथाविधि इतने ही प्रकार के योजन-प्रयुक्त किये गये।