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जैनविद्या - 19
प्रक्रियागत उल्लेखनीय विशेषता है - समास - शैली में अर्थगर्भ बातों की विस्मयकारी अवतारणा । इस सन्दर्भ में आठ प्रकार के कर्मों के नोकर्म-द्रव्यकर्म की विवेचना में रचित उपमा - दृष्टान्त मूलक निम्नांकित गाथा द्रष्टव्य है
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पडपडिहारसिमज्जा आहारं देह उच्चणीचं गं । भंडारी मूलाणं णोकम्मं दवियकम्मं तु ॥ 69 ॥ गो. क.
अर्थात् ज्ञानावरण का नोकर्म-द्रव्यकर्म घना कनात का परदा है; क्योंकि वह वस्तु को विशेष रूप से ग्रहण करने में बाधक होता है। दर्शनावरण का नोकर्म-द्रव्यकर्म द्वार पर नियुक्त द्वारपाल है; क्योंकि वह वस्तु को सामान्य रूप से भी देखने में बाधक है। वेदनीय का नोकर्म-द्रव्यकर्म मधु से लिप्त तलवार की धार है, क्योंकि उसको चाटने से पहले तो मधु के मधुर आस्वाद का सुख मिलता है और फिर जीभ कट जाने से वेदना भी होती है। मोहनीय का नोकर्म-द्रव्यकर्म मद्य के समान है; क्योंकि मद्यजनित मदान्धता के कारण जीव को सम्यग्दर्शन में बाधा पहुँचती है। आयु का नोकर्म-द्रव्यकर्म चार प्रकार का आहार है; क्योंकि इस आहार के शरीर के बलाधान में कारण होने से यह उसकी स्थिति का निमित्त होता है। नाम का नोकर्म-द्रव्यकर्म औदारिक आदि शरीर है; क्योंकि यह योग का उत्पादक होने से औदारिक आदि शरीर को उत्पन्न करता है । गोत्र का नोकर्म - द्रव्यकर्म उच्च-नीच शरीर है; क्योंकि वह उच्च और नीच कुल को व्यक्त करता है । अन्तराय का नोकर्म-द्रव्यकर्म कृपण भण्डारी है; क्योंकि वह भोगोपभोग आदि की वस्तुओं में विघ्न डालता है।
गूढ़ विषय को समझाने के क्रम में दृष्टान्तों या उपमाओं का आश्रय लेना प्राचीन व्याख्याकारों की सुपरिचित पद्धति रही है। कहना न होगा कि सिद्धान्तचक्रवर्तीजी ने भी विषय-विवेचना के क्रम में इसी पद्धतिको मूल्य दिया है उदाहरणार्थ, निम्नांकित गाथा द्रष्टव्य है -
देहोदयेण सहिओ जीवो आहरदि कम्म-णोकम्मं । पडिसमयं सव्वंगं तत्तायसपिंडओव्व जलं ॥ 3 ॥
यहाँ सिद्धान्तचक्रवर्त्तीजी ने कर्म को ग्रहण करने का मूल आधार शरीर को माना है। इनका आशय है कि जैसे तप्त लौहपिण्ड अपने चारों ओर के प्रदेशों के जल को या जलीय आर्द्रता को खींच लेता है, वैसे ही शरीर नामकर्म के उदय के साथ ही जीव अपने अंगों या सभी आत्मप्रदेशों से कर्म - नोकर्म को ग्रहण करता है। तात्त्विकता समझाने के लिए आचार्य श्री द्वारा उपमा अलंकार का उपयोग ततोऽधिक सार्थक हुआ है। इससे विषयगत गूढता अतिशय सुगम हो गई है।
इसी प्रकार आयुकर्म की बन्ध शक्ति को समझाने के क्रम में विषयगत अर्थ - जाटिल्य को सरल बनाने के निमित्त आचार्य श्री द्वारा लिये गये उपमा अलंकार के आश्रय का एक और निदर्शन निम्नांकित गाथा में द्रष्टव्य है
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कम्मकयमोहवड्ढिय संसारम्मि य अणादिजुत्तम्मि ।
जीवस्स अवद्वाणं करेदि आऊ हलिव्व णरं ॥ 11 ॥ गो.क.