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जैनविद्या - 19
अर्थात् आयुकर्म का उदय, कर्म-कृत अज्ञान, असंयम तथा मिथ्यात्व के द्वारा वृद्धि को प्राप्त अनादि संसार की चार गतियों (वनस्पति, तिर्यंच, मनुष्य और देव) में जीव को उसी प्रकार रोके रहता है, जिस प्रकार काठ अपने छिद्र में पैर डालनेवाले व्यक्ति को रोके रहता है। यहाँ काठ' (हाल) उपमान और आयु कर्म का उदय उपमेय की अपूर्वता ततोऽधिक आवर्जक बन पड़ी है।
विवेचना की इससे सरल पद्धति और क्या हो सकती है? अवश्य ही, आचार्यश्री अपना पाण्डित्य प्रदर्शित करने के उतने पक्षपाती नहीं थे, जितने वे कर्म-सिद्धान्त की गहनता को आसानी से जनबोध्य बनाने के आग्रही थे। वस्तुतः, इस गाथा में निहित अर्थगूढता के व्यक्तीकरण के लिए लौकिक तत्त्व से दीप्त उपमा के विनियोग में बिम्बात्मक अभिरामता दर्शनीय है।
सरल परिभाषा के माध्यम से वस्तु-स्वरूप को सहजता से बोधगम्य कराने की पद्धति भी आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती की अपनी है। इनकी यह पद्धति निम्नांकित गाथा में द्रष्टव्य है -
कम्मत्तणेण एक्कं दव्वं भावोत्ति होदि दुविहं तु।
पोग्गलपिंडो दव्वं तस्सत्त भावकम्मं तु॥6॥गो.क. भावकर्म और द्रव्यकर्म को परिभाषित करते हुए आचार्यश्री ने उक्त गाथा में कहा है कि सामान्यतः कर्म, कर्म-स्वरूप की दृष्टि से एक है, पर वह द्रव्य और भाव की दृष्टि से दो प्रकार का है। इनमें द्रव्यकर्म पुद्गलपिण्ड है और उस पिण्ड में रहनेवाली फल देने की शक्ति भावकर्म है। अथवा, कार्य में कारण के उपचार से उक्त शक्ति द्वारा उत्पन्न अज्ञान आदि भी भावकर्म हैं।
आचार्यश्री की गाथाएँ कहीं-कहीं चित्रबन्धात्मक जैसी भी है जिसका निदर्शन शब्दालंकारपरम्परा में बहुधा उपलभ्य है। प्राचीन जैनाचार्यों की काव्य रचना-शैली की यह विशेषता प्राकृत
और संस्कृत वाङ्मय में सार्वत्रिक रूप से प्राप्त होती है। आचार्यश्री द्वारा प्रस्तुत शब्द के प्रायोगिक चमत्कार के दर्शन निम्नांकित गाथा में सुलभ हैं -
बासूप बासूअ वरदिट्ठीओ सूबाअ सूबापजहण्णकालो।
बीबीवरो बीबिजहण्णकालो सेसाणमेवं वयणीयमेदं ॥ 148 ॥गो.क. इस गाथा में आचार्यश्री ने एकेन्द्रिय आदि जीवों के स्थितिभेदों में बादर और सूक्ष्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, असंज्ञी और संज्ञी के पर्याप्त और अपर्याप्त भेद से चौदह जीवसमासों में उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति-बन्ध का विभाग दरसाया है। प्रस्तुत विलक्षण गाथा में संक्षिप्ताक्षरों द्वारा संकेतित पूर्ण शब्द इस प्रकार है -
बा-बादर; सू-सूक्ष्म; प-पर्याप्तक;
अ-अपर्याप्तक; बी-द्वीन्द्रिय; बि-द्वीन्द्रिय। कहना न होगा कि सिद्धान्तचक्रवर्तीजी अर्थ-चमत्कार के विचक्षण विनियोक्ता तो थे ही, महान् शब्दशास्त्री भी थे। प्राकृत भाषा और साहित्य के मर्मज्ञ जैन दार्शनिकों में इनकी द्वितीयता