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________________ जैनविद्या ज्ञातव्य है, आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती ने अपने इस 'गोम्मट' उपनामधारी शिष्य चामुण्डराय के ज्ञानोन्मेष के लिए, 'षट्खण्डागम' से आकलित कर, जीवकाण्ड (कुल 734 गाथाएँ) और कर्मकाण्ड (कुल 972 गाथाएँ) नामक दो भागों में शिष्य नाम से व्याहरित 'गोम्मटसार' ग्रन्थ की रचना की। स्पष्ट है कि 'गोम्मटसार' षट्खण्डागम- परम्परा का ग्रन्थ है । इसके प्रथम भाग 'जीवकाण्ड' नामसे स्वतोव्यक्त है कि इसमें जीवों के विभिन्न आयामों का स्वरूप निरूपण किया गया है और द्वितीय भाग 'कर्मकाण्ड' में कर्म सिद्धान्त के विभिन्न आयामों का प्रज्ञापन-प्ररूपण हुआ है, जिसमें वर्णित विषयों का पल्लवन नौ अधिकारों में हुआ है प्रकृति-समुत्कीर्तन, बन्धोदयसत्त्व सत्त्वस्थानभंग, त्रिचूलिका, स्थान- समुत्कीर्त्तन, प्रत्यय, भावचूलिका, त्रिकरण - चूलिका और कर्मस्थिति - रचना । - 19 आचार्यश्री सिद्धांतचक्रवर्ती ने इस कर्मकाण्ड में कर्म - सिद्धान्त का जैसा सुव्यवस्थित, सुसम्बद्ध एवं पुंखानुपुंख निरूपण किया है वैसा अन्यत्र अप्राप्य है। जैनदृष्टि में कर्म मुख्यतः दो प्रकार का है - भावकर्म और द्रव्यकर्म । वस्तुत: भावकर्म जैनेतर दर्शनों, विशेषतः बौद्धों के संस्कार तथा द्रव्यकर्म योगदर्शन की वृत्ति और न्याय दर्शन की प्रवृत्ति का समानान्तर है। अन्य दर्शनं जहाँ राग और द्वेष से आविष्ट जीव की क्रिया को कर्म कहते हैं और इस कर्म के क्षणिक होने पर भी तज्जन्य संस्कार को स्थायी मानते हैं वहीं जैनदर्शन का सिद्धान्त है कि राग और द्वेष से आविष्ट जीव के प्रत्येक कर्म या क्रिया के साथ एक प्रकार का आणविक द्रव्य आत्मा की ओर आकृष्ट होता है और उसके राग-द्वेष के परिणामों का निमित्त पाकर आत्मा के साथ बन्धको प्राप्त करता है और वही द्रव्य कालान्तर में आत्मा की शुभाशुभ-प्राप्ति में निमित्त बनता है । जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादि है । सिद्धान्तचक्रवर्त्तीजी का कर्म-सिद्धान्त जैनों के परम्परागत कर्म-सिद्धान्त के ही अनुरूप है । परन्तु उसकी उपस्थापना शैली इनकी अपनी है । सैद्धान्तिक व्याख्या के क्रम में उपन्यस्त उदाहरण, निदर्शन या दृष्टान्त भी इनके अपने हैं । जैसे कर्म के स्वभाव की विवेचना करते हुए इन्होंने कहा है - पयडी सील सहावो जीवंगाणां कणयोवले मलं वा ताणत्थित्तं सयं अणाइसंबंधो। 53 सिद्धं ॥ 2 ॥ गो. क. अर्थात् जो कारण-निरपेक्ष होता है उसे प्रकृति या शील या स्वभाव कहते हैं । राग-द्वेष आदि रूप में परिणति आत्मा का स्वभाव है और राग-द्वेष उत्पन्न करना कर्म का स्वभाव है । जैसे, सोना और उसमें निहित मैल का सम्बन्ध आदि है, वैसे ही जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादि है। और फिर, जीव तथा कर्म का अस्तित्व भी तो स्वतः सिद्ध है; क्योंकि 'मैं' प्रत्यय से यदि आत्मा या जीव के अस्तित्व की सिद्धि होती है, तो किसी के दरिद्र और किसी के धनी होने से कर्म का अस्तित्व प्रमाणित होता है । सिद्धान्तचक्रवर्त्तीजी ने शौरसेनी प्राकृत की प्रकृति और प्रवृत्ति की विविधता और विचित्रता के साथ ‘गोम्मटसार' की गाथाओं की रचना की है। शौरसेनी - निबद्ध इन गाथाओं की रचना
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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