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________________ 52 जैनविद्या - 19 ___ कालान्तर में उक्त दोनों, 'धवला'-'जयधवला' टीकाएँ जब दुर्गाह्य प्रतीत होने लगीं, तब सिद्धान्तचक्रवर्ती आचार्यश्री ने इन टीकाओं के मूल प्रतिपाद्य के सारभाग को स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में गाथाबद्ध किया। धवला-सिद्धान्त का अनुशीलन करके 'गोम्मटसार' और 'जयधवला' टीका का मनन करके 'लब्धिसार' जैसे कालोत्तीर्ण ग्रन्थों की इन्होंने रचना की। इन्हें सिद्धान्तचक्रवर्ती की उपाधि विद्वज्जगत् की ओर से प्राप्त हुई थी। इस सन्दर्भ में इन्होंने 'गोम्मटसार' के 'कर्मकाण्ड' में इस प्रकार निर्देश किया है - जह चक्केण य चक्की छक्खंडं साहियं अविग्घेण। तह मइ-चक्केणमया छक्खंडं साहियं सम्मं॥397॥ अर्थात् जिस प्रकार चक्रवर्ती राजा अपने चक्ररत्न से भारतवर्ष के छहखण्डों को बिना किसी विघ्न-बाधा के स्वायत्त करता है, उसी प्रकार मैं (नेमिचन्द्र) ने अपने बुद्धिचक्र से छह खण्डों, यानी षट्खण्डागम-सिद्धान्त को सम्यक् रीति से अपने अधीन किया है। जैन साहित्येतिहास में 'गोम्मटसार' की जो आविर्भाव कथा अंकित है वह बड़ी रोचक है। गंगवंशी राजा राचमल्ल के प्रधानमन्त्री और सेनापति चामुण्डराय ने आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती का शिष्यत्व स्वीकार किया था। अपने अप्रतिहत युद्धकौशल से उसने 'वीरमार्तण्ड' की उपाधि आयत्त की थी। उसने मैसूर-राज्य के श्रमणबेलगोला में अवस्थित विन्ध्यपर्वत पर आदिनाथ ऋषभदेव के कनिष्ठ पुत्र तथा चक्रवर्ती भरत के अनुज बाहुबली स्वामी की सत्तावन फुट ऊँची अतिशय भव्य शिला-प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराई थी इधर उत्तर भारत में अयोध्यानरेश चक्रवर्ती भरत ने अपने तपोदीप्त अनुज बाहुबली स्वामी की एक प्रतिमा स्थापित कराई थी। वह प्रतिमा कुक्कुटजाति के भयंकर जहरीले नागों से व्याप्त होने के कारण 'कुक्कुटजिन' कहलाती थी। उत्तर भारत की इस मूर्ति से भिन्नता बतलाने के लिए चामुण्डराय द्वारा प्रतिष्ठापित प्रतिमा 'दक्षिणकुक्कुटजिन' कहलाई। यह प्रसंग 'गोम्मटसार' के 'कर्मकाण्ड' नामक दूसरे भाग में इस प्रकार चर्चित है - गोम्मटसंगहसुत्तं गोम्मटसिहरुवरि गोम्मटजिणो य। गोम्मटरायविणिम्मिय-दक्खिणकुक्कुडजिणो जयउ॥968॥ अर्थात् गोम्मटसार संग्रह, गोम्मटशिखर पर विराजित गोम्मटस्वामी तथा गोम्मटराय द्वारा विनिर्मित 'दक्षिणकुक्कुटजिन' की जय हो। प्राकृत-वाङ्मय के प्रज्ञापुरुष डॉक्टर आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्ये के अनुसार चामुण्डराय अपने परिवार में 'गोम्मट' नाम से जाना जाता था। उसके इसी नाम के आधार पर उसके द्वारा प्रतिष्ठापित बाहुबली स्वामी की प्रतिमा की संज्ञा 'गोम्मटेश्वर' हुई। 'गोम्मटेश्वर' का अर्थ है - गोम्मट (चामुण्डराय) का ईश्वर (देवता)। कालक्रम से बाहुबली स्वामी की यथाप्रतिष्ठापित प्रतिमा अपने प्रतिष्ठाता से तदात्मता प्राप्त कर 'गोम्मट' 'गोम्मटेश' या 'गोम्मटेश्वर' नाम से लोकोच्चरित होने लगी।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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