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जैनविद्या - 19
अप्रेल 1997-1998
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सिद्धान्तचक्रवर्त्ती के 'गोम्मटसार' का कर्मकाण्ड : कर्मसिद्धान्त का प्रामाणिक सन्दर्भ
विद्यावाचस्पति डॉ. श्रीरंजनसूरिदेव
आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती युगप्रवर्त्तक जैन चिन्तकों में ऐतिहासिक क्रोशशिला के संस्थापक प्रमाणपुरुष के रूप में ततोऽधिक प्रख्यात हैं । इसीलिए, इन्हें आर्हत चिन्तन की महनीय परम्परा के विस्तारक आधुनिक जैन चिन्तक पुण्यश्लोक आचार्य नेमिचन्द्र शास्त्री ने 'सारस्वताचार्य' शब्द से विशेषित किया है । (द्र. : 'तीर्थंकर महावीर और उनकी आचार्य परम्परा', 'भाग 2 )
शास्त्रीय रचना-जगत् में टीकाओं के माध्यम से अर्थ-ग्रन्थिल विषयों को सुगम और सुबोध बनाने की परिपाटी प्राचीन काल से प्रचलित है । आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्त्ती (विक्रम की 10-11वीं शती) इसी परिपाटी के कूटस्थ परिपोषकों में पांक्तेय हैं। विक्रम के नवम शतक में 'षट्खण्डागम' की 'धवला' (वीरसेनाचार्य) और आचार्य कुन्दकुन्द ( ईसवी प्रथम शती) के ‘कषायप्राभृत' की चार विभक्तियों पर 'जयधवला' (जिनसेनाचार्य द्वितीय) टीकाओं की रचना • के बाद सैद्धान्तिक वैदुष्य का मापदण्ड इन्हीं दोनों टीका-ग्रन्थों को मान लिया गया और इनके अध्ययन-अनुशीलन का सार्वत्रिक प्रचार हुआ। ज्ञातव्य है, प्राचीनकाल में किसी शास्त्रीयमूल ग्रन्थ पर लिखी गई टीकाएँ इतनी मौलिक और तात्त्विक होती थीं कि उन्हें एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में पण्डितों का समादर प्राप्त होता था ।