SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 59
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ 50 जैनविद्या - 19 णत्थि य रायद्दोसा जाणइ कज्जाकजं सेयमसेयं च सव्वसमपासी। दयदाणरदो य मिदू लक्खणमेयं तु तेउस्स ॥ 515॥ चागी भदो चोक्खो उज्जुवकम्मो य खमदि बहुगंपि। साहुगुरुपूजणरदो लक्खणमेयं तु पम्मस्स ॥516॥ ण य कुणइ पक्खवायं णवि य णिदाणं समो य सव्वेसिं। णत्थि य रायद्दोसा गेहोवि य सुक्कलेस्सस्स॥517॥ गोम्मटसार (जीव.) - कार्य-अकार्य को तथा सेवनीय-असेवनीय को जानता हो, सबको समानरूप से देखता हो, दया और दान में प्रीति रखता हो, मन-वचन-काय से कोमल हो - ये तेजोलेश्या के लक्षण हैं । 5151 - त्यागी हो, भद्र परिणामी हो, सरल स्वभावी हो, शुभ कार्य में उद्यमी हो, कष्ट और अनिष्ट उपद्रवों को सह सकता हो, मुनिजन और गुरुजन की पूजा में प्रीति रखता हो - ये पद्म लेश्यावाले के लक्षण हैं। 5161 न पक्षपात करता हो, न निदान करता हो, सबमें समान भाव रखता हो, इष्ट-अनिष्ट में रागद्वेष न करता हो, पुत्र-मित्र-स्त्री में रागी न हो - ये सब शुक्ल लेश्यावाले के लक्षण हैं। 517। सं. - डॉ. आ. ने. उपाध्याय, पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy