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________________ जैनविद्या - 19 (6) पडिणी गमन्तराए उवघादो तप्पदो सणिण्हवणो॥ __आवरण दुगंभूयो बंधादि अच्चासणाएदि ।। 800 ॥ - वही (7) अरहंत सिद्धचेदिय तवसुद गुरुधम्म संघ पडिणीगो। वंधरि दंसण मोहं अणंत संसारिओ जेण॥ 802 ॥ - वही (8) तिव्व कसाओ बहुमोह परिणदो राग-दोस-संतत्तो।। बंधदि चरित्तमोहं दुविहं पि चरित्त गुणघादी ।। 803 ॥ - वही (9) पाणवधादीसु रदो, जिण पूजा मोक्खमग्ग विग्घयरो। अज्जेइ अंतरायं, ण लहइ जं इच्छियं जेणं ॥ 810।। - वही (10) मिच्छो हु महारंभो, णिस्सीलो तिव्वलोह संजुत्तो। णिर या उगं णि बंधइ, पावमई रुद्द परिणामी॥ 804 ।। - वही (11) उम्मग्गदेसगो मग्गणासगो, गूढहियय माइल्लो। . सठसीलो य ससल्लो, तिरयाउं बंधदे जीवो॥ 805 ॥ - वही (12) पयडीए तणुकसाओ दाणरदी सीलसंजमविहीणो। - मज्झिम गुणेहिं जुत्तो मणुवाऊं बंधदे जीवो।। 806 ॥ - वही (13) अणुवदमहव्वदेहिं य वालतवाकामणिज्जराए य॥ देवाउगं णिबंधइ सम्माइट्ठी य जो जीवो ॥ 807 ॥ - वही (14) मण वयण कायवक्को माइल्लो गारवेहिं पडिबद्धो। असुहं बंधदि णामं तप्पडिवक्खेहिं सुहणामं ।। 808 ॥ - वही मंगल कलश, ___394, सर्वोदयनगर, आगरा रोड, अलीगढ़ 202001
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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