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________________ 48 जैनविद्या - 19 देव-गति सुख-भोग भोगने तथा आत्म-उत्कर्ष प्राप्त करने के लिए परम आवश्यक है। जो जीव सम्यग्दृष्टि है वह मात्र सम्यक्त्व के द्वारा, अथवा मात्र अणुव्रतों और महाव्रतों के बलबूते पर तथा जो मिथ्यादृष्टि है वह आत्म-बोध के अभाव में भी तप से या अकाम निर्जरा से देवायु का बंध बाँधता है। सम्यग्दर्शन के कारण इन्द्रगण अपने अगृहीत कर्मक्षय करने के लिए तप और संयम-साधना हेतु मनुष्य गति प्राप्त करने की मंगल कामना करते हैं। देव-लोक में तप और संयम-साधना सम्पन्न करना प्रायः सुलभ नहीं है। जो जीव मन, वचन और शरीर से कुटिल हो, मायाचारी हो, आत्म-प्रशंसक हो अथवा आकांक्षी हो वह अशुभ नाम कर्म का बंध बाँधता है। इनके विपरीत कार्य करनेवाला जीव शुभनाम कर्म बाँधा करता है। ___ वसुकर्मों की श्रृंखला में गोत्र-कर्म-बंध अन्तिम है। जो जीव अरिहंतादि पंच परमेष्ठियों में भक्ति रखता हो, शास्त्रों में रुचिवंत हो, सद् विचारोंवाला हो वह उच्चगोत्र के बंध बाँधता है जबकि इसके विपरीत करनेवाला जीव नीच गोत्र का बंध बाँधता है। ___इस प्रकार प्राणी जो अनादिकाल से वसु कर्मों के बंध में बँधता चला आ रहा है, उसके निवारणार्थ उसे चारित्र-साधना करने के लिए तद्नुसार चर्या करना परम आवश्यक होता है। सार और सारांश में कहा जा सकता है कि मिथ्यात्व कर्म बंध का मुख्य कारण है और निवारण का मुख्य आधार है - सम्यक्त्व। इत्यलम्! (1) पयडी सील सहावो जीवंगाणं अणाइ संबंधो। कणयोवले मलं वा ताणत्थित्तं सयं सिद्धं ॥ 1 ॥ - गोम्मटसार, कर्मकाण्ड (2) आवरण मोहविग्घं घादी जीव गुण घादणत्तादो। आउगणाम गोदं वेयणियं तह अघादित्ति ॥ 9 ॥ - वही (3) कम्माणं संबंधो बंधो उक्कट्टणं हवे बड्ढी। संकमण मणत्थगदो हाणी ओकट्ठणं णाय ॥ 438 ।। - वही (4) अण्णत्थठियस्सुदये संथुहणंमुदीरणा हुअत्थित्तं । सत्तं सकालपत्तं उदओ होदित्ति णिद्दिट्ठो ॥ 439 ॥ - वही (5) उदये संकममुदये चउसुवि दादुकमेण णोसक्कं । उवसंतं च णित्तिं णिकाचिदं होदि जं कम्मं ॥ 440॥ - वही
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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