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________________ 40 गोम्मट संगह सुत्तं गोम्मटदेवेण गोम्मट रइयं । णिज्जरटुं कम्माण जैनविद्या - 19 तच्चट्ठवधारणटुं • अर्थात् कर्मों की निर्जरा और तत्त्व की अवधारणा के लिए गोम्मटदेव ने उत्तम गोम्मट संग्रह सूत्र की रचना की, से भी ग्रन्थ के उपर्युक्त नामों के उक्त अभिधा अर्थ ध्वनित होते हैं और ग्रन्थकार का नाम गोम्मटदेव अभिसूचित होता है । च ॥ 965 ॥ यहाँ सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि यह गोम्मटदेव कौन हैं। संस्कृत टीकाकार ने इस गाथा की व्याख्या इस प्रकार की है - इदं गोम्मटसंग्रहसूत्रं गोम्मटदेवेन श्रीवर्धमानदेवेन गोम्मटं । नयप्रमाणविषयं रचितम् किमर्थं ? ज्ञानावरणादि-कर्मनिर्जरार्थम् ॥ अर्थात्-गोम्मटदेव श्रीवर्धमानदेव ने गोम्मट अर्थात् नय प्रमाणविषयक यह गोम्मटसार संग्रह सूत्र ज्ञानावरण आदि कर्मों की निर्जरा के लिए रचा। इसके अनुसार श्रीवर्धमानदेव ग्रन्थ के कर्त्ता हैं, किन्तु यह व्याख्या कितनी समीचीन है, इस पर विचार करना आवश्यक है । सर्वज्ञ केवलि श्रीवर्धमानदेव (भगवान महावीर स्वामी) द्वादशांगवाणी के प्रस्तोता तो थे, किन्तु क्या उन्होंने स्वयं कोई ग्रन्थ रचा था, यह कल्पनातीत है। भगवान वर्द्धमान महावीर स्वामी के लिए प्रचलित विभिन्न नामों में गोम्मटदेव नाम भी सामान्यतया देखने-सुनने में नहीं आया है। गोम्मटसार (जीवकाण्ड) की प्रस्तावना में सिद्धान्ताचार्य पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री ने यह उल्लेख किया है कि 'गोम्मट' शब्द न तो संस्कृत भाषा के कोशों में मिलता है और न प्राकृत भाषा के कोशों में। डॉ. आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्ये का 'गोम्मट' शीर्षक से एक लेख अनेकान्त, वर्ष 4 की किरण तीन-चार में प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने यह उल्लेख किया है कि भार की आधुनिक भाषाओं में मराठी ही ऐसी भाषा है जिसमें यह शब्द (गोम्मट) प्रायः व्यवहृत हुआ है। गोम्मट शब्द मराठी में एक विशेषण है और उसका अर्थ है साफ, सुन्दर, आकर्षक, अच्छा आदि । कोंकणी भाषा में भी 'गोम्टो' शब्द है और उसका वही अर्थ है जो मराठी में है | अक्षरशः 'गोम्मट' शब्द का अर्थ है - उत्तम आदि । कन्नड़ भाषा में भी 'गोम्मट' शब्द प्रसन्न करनेवाला या उत्तम के अर्थ में तथा विशेषण एवं नाम के रूप में व्यवहृत हुआ है। 'कर्मकाण्ड' की उपर्युक्त गाथा तथा गाथा 968, जो निम्नवत है, में यह शब्द विशेषण और नाम स्वरूप एक से अधिक वस्तुओं के लिए प्रयुक्त हुआ है - - गोम्मट संगह सुत्तं गोम्मटसिंहरुवरि गोम्मटजिणो य । गोम्मटरायविणिम्मिय दक्खिणकुक्कुडजिणो जयउ ॥ पश्चिमी गंग नरेश मारसिंह द्वितीय (961-974 ई.) और राचमल्ल चतुर्थ ( 975-984 ई.) के यशस्वी सेनापति एवं महामात्य चामुण्डराय का एक अन्य नाम गोम्मट होने का उल्लेख एपिग्राफिया कर्णाटका - भाग दो में सं. 238 पर अंकित सन् 1180 ई. के एक शिलालेख में होने शास्त्री ने सूचित की है। डॉ. उपाध्ये ने भी अपने उपर्युक्त लेख में इसे चामुण्डराय
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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