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जैनविद्या - 19
का घरेलू नाम बतलाया है और इस आधार पर चामुण्डराय द्वारा श्रवणबेलगोला में प्रतिष्ठापित बाहुबलि स्वामी की मूर्ति की 'गोम्मटेश्वर' अर्थात् 'गोम्मट के देवता' नाम से प्रसिद्धि होने की बात भी लिखी है। उक्त मूर्ति के 'गोम्मटेश्वर', 'गोम्मटेश', 'गोम्मटनाथ', 'गोम्मटस्वामी', 'गोम्मटजिन' नामों से विख्यात होने पर कालान्तर में दक्षिण भारत में अन्य स्थानों पर बनी बाहुबलि स्वामी की मूर्तियों को भी इन नामों से पुकारा जाने लगा और ये शब्द भगवान ऋषभदेव के कनिष्ठ पुत्र बाहुबलि के नाम के पर्यायवाची-से हो गये। शरदचन्द्र घोषाल, नाथूराम प्रेमी, जुगमन्दरलाल जैनी, गोविन्द पै, श्रीकण्ठ शास्त्री और डॉ. हीरालाल जैन सदृश विद्वानों ने भी बाहुबलि का अपरनाम गोम्मट मान लिया। गोविन्द पै ने तो जैन सिद्धान्त भास्कर, वर्ष 4, किरण 2 में प्रकाशित अपने लेख में यहाँ तक लिखा है कि संस्कृत शब्द 'मन्मथ', जिसका अर्थ प्रेम के देवता कामदेव है, से बिगड़कर 'गोम्मट' शब्द बना है। चूंकि जैन परम्परा में 24 कामदेवों में ऋषभपुत्र बाहुबलि प्रथम कामदेव माने गये हैं, अतः उन्हें बाहुबलि के लिये 'गोम्मट' नाम का प्रयोग युक्तिसंगत लगा। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि 'गोम्मटसार' ग्रन्थ में विवेचित विषयवस्तु से और ग्रन्थ कर्तृत्व से बाहुबलि का कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः कर्मकाण्ड की गाथा 965 में उल्लिखित 'गोम्मटदेव' और 'गोम्मट संग्रह सूत्र' के प्रसंग में गोम्मट का अर्थ बाहुबलि प्रासंगिक नहीं है। इस ग्रन्थ पर कन्नड़ में वीरमार्तण्डी' नामक टीका रचनेवाले उक्त चामुण्डराय अपरनाम गोम्मटराय के लिए भी 'गोम्मटदेवेन रइयं गोम्मट संगह सुत्तं' रूप से उल्लेख किया गया हो, ऐसा नहीं लगता। . गोविन्द पै ने अपने उक्त लेख में यह भी लिखा है कि 'गोम्मट' का अर्थ 'गो' अर्थात् 'वाणी के देवता' भी होता है और यह शब्द भगवान महावीर के लिए प्रयुक्त होता था और यह कि यह शब्द किसी भी जिनेन्द्र या केवलि, जिनमें बाहुबलि भी सम्मिलित हैं, के लिए प्रयुक्त हो सकता है। उनकी इस प्रतिपत्ति के परिप्रेक्ष्य में तो कर्मकाण्ड की गाथा 965 की संस्कृत टीका में 'गोम्मटदेवेन श्रीवर्धमानदेवेन' लिखा जाना भी असंगत नहीं प्रतीत होता, ऐसा प्रतीत होता है कि कदाचित् रचनाकार ने भक्तिवश द्वादशांगवाणी के प्रस्तोता सर्वज्ञ केवलि श्रीवर्धमानदेव (भगवान महावीर स्वामी) को रचनाकार का मान देने के लिए ऐसा किया हो।
जब भगवान महावीर स्वामी व बाहुबलि स्वामी गोम्मट कहला सकते हैं और चामुण्डराय का घरेलू नाम गोम्मट रहा हो सकता है, तब रचनाकार का स्वयं का नाम भी गोम्मटदेव रहे होने की सम्भावना को पूर्णतया अमान्य नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा रहा, तो रचनाकार ने उक्त गाथा 965 में 'गोम्मटदेवेण' अपने लिए भी अभिधा अर्थ में प्रयुक्त किया हो सकता है। किन्तु यह अभी गवेषणा का विषय है। ग्रन्थ अपने रचनाकार के विषय में प्रायः मौन है। केवल 'कर्मकाण्ड' की गाथा 408 में अभयनन्दि का सादर उल्लेख करते हुए नेमिचन्द्र नाम आया है
और गाथा 967, जो एक रूपक के रूप में है और निम्नवत है, से रचनाकार का नाम बेमिचन्द्र ध्वनित होता है -
सिद्धंतुदयतडुग्गय णिम्मलवर णेमिचन्दकरवलिया। गुणरयणभूषणंबुहिवेला भरउ भुवणयलं॥