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________________ जैनविद्या - 19 अप्रेल - 1997-1998 39 गोम्मटसार के कर्ता - श्री रमाकान्त जैन प्राकृत भाषा में क्रमशः 734 और 972 गाथाओं में 'जीवकाण्ड' और 'कर्मकाण्ड' नाम से दो खण्डों में निबद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ 'गोम्मटसार' नाम से सामान्यतया जाना जाता है। यह नाम इस ग्रन्थ पर अभयचन्द्र सूरि सिद्धान्तचक्रवर्ती द्वारा 1275 ई. में संस्कृत में रचित 'मन्दप्रबोधिका टीका' तथा केशववर्णी द्वारा 1359 ई. में संस्कृत मिश्रित कन्नड में रचित 'कर्णाटवृत्ति जीवतत्त्वप्रदीपिका' नामक टीका में मिलता है । मन्दप्रबोधिका टीका में इसे 'पञ्चसंग्रहशास्त्र' और कर्णाटवत्ति में 'पञ्चसंग्रहप्रपञ्च' नाम भी दिया गया है। ग्रन्थकार ने 'कर्मकाण्ड' की गाथा 811 में इसका नाम 'गोम्मट संग्रह', गाथा 965 व 968 में 'गोम्मट संगह सुत्तं' तथा गाथा 972 में 'गोम्मट सूत्र' दिया है। 'गोम्मटसार' शब्द का अभिधा अर्थ है गोम्मट का सार अर्थात् - गोम्मट नामक किसी विषयवस्तु अथवा ग्रन्थ का सार-संक्षेप। विवेच्य ग्रन्थ में महाकर्मप्रकृतिप्राभूत से उद्धृत प्रथम सिद्धान्त ग्रन्थ के जीवस्थान, क्षुद्रबन्ध, बन्धस्वामित्व, वेदनाखण्ड, वर्गणाखण्ड और महाबन्ध इन छह खण्डों में विवेचित जीवादिक विषयों का सार-रूप में विवेचन हुआ है। इस विवेचित विषयवस्तु और महाकर्मप्रकृतिप्राभृत के लिए 'गोम्मट' संज्ञा पढ़ने-सुनने में नहीं आई। 'गोम्मट संग्रह' का अर्थ गोम्मट का संग्रह या संकलन, 'गोम्मट संगह सुत्तं' का अर्थ गोम्मट का संग्रह सूत्र अर्थात् किन्हीं गोम्मट द्वारा संग्रहीत सूत्र तथा 'गोम्मट सूत्र' का अर्थ गोम्मट का सूत्र होता है। 'कर्मकाण्ड' की गाथा -
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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