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जैनविद्या - 19
पहिया जे छप्पुरिसा ...... पहिया जे छप्पुरिसा परिभट्टारण्ण मझदेसम्मि। फलभरियरूक्खमेगं पेक्खित्ता ते विचिंतंति॥507॥ णिम्मूलखंधसाहुवसाहं छित्तुं चिणित्तु पडिदाई। . खाउं फलाइ इदि जं मणेण वयणं हवे कम्मं ॥508॥
गोम्मटसार (जीव.) - कृष्ण आदि एक-एक लेश्यावाले छह पथिक मार्ग भूल गये। वन के मध्य में फलों से लदे
हुए एक वृक्ष को देखकर वे सब अपने मन में विचार करने लगते हैं - - कृष्ण लेश्यावाला पथिक विचार करता है कि वृक्ष को जड़ से उखाड़कर इसके फल
खाऊँगा। - नील लेश्यावाला पथिक विचारता है कि इस वृक्ष के स्कंध (तने) को काटकर फल खाऊँगा। - कपोत लेश्यावाला पथिक सोचता है कि इसकी बड़ी डाल काटकर फल खाऊँगा। - तेजो लेश्यावाला विचारता है – इसकी छोटी डाल काटकर फल खाऊँगा। - पद्म लेश्यावाला विचारता है – वृक्ष को हानि न पहुँचाकर केवल फल ही तोड़कर खाऊँगा। - शुक्ल लेश्यावाला विचारता है कि नीचे गिरे हुए फलों को ही खाऊँगा।
इस प्रकार मनपूर्वक जो वचन होता है वह क्रम से उन लेश्याओं का कार्य होता है।
सं. - डॉ. आ. ने. उपाध्याय,
पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री