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जैनविद्या 19
वृद्धि होने से यह आत्मा क्रम से पीत से पद्म और पद्म से शुक्ल में आता है और विशुद्धि की हानि होने से क्रम से शुक्ल से पद्म और पद्म से पीत लेश्या में आता है। इस प्रकार विशुद्ध भावों की हानि - वृद्धि से यह आत्मा शुभ लेश्याओं में परिणमन करता है।
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जैसा कि विदित है कि समग्र जैन वाङ्मय अध्यात्म - शास्त्र कहलाता है और वह चार भागों (भेदों) में विभाजित है - प्रथमानुयोग, चरणानुयोग, करणानुयोग और द्रव्यानुयोग । गोम्मटसार अध्यात्म ग्रन्थ है और यह द्रव्यानुयोग के अन्तर्गत परिगणित है । यथार्थ वस्तु का श्रद्धान, वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान, तत्त्वानुचिन्तन और तदर्थ नियमित स्वाध्याय परमावश्यक है । अध्यात्म विषयों के ज्ञान के लिए स्वाध्याय किया जाता है और स्वाध्याय के लिए चारों अनुयोगों के अन्तर्ग सभी शास्त्रों का स्वाध्याय स्वशक्त्यानुसार अपेक्षित है । केवल शास्त्र विशेष का स्वाध्याय या मात्र तत्त्वचर्चा से शुद्ध-प्रबुद्ध आत्मा का लाभ सम्भव नहीं है, अपितु तत्त्वों का यथार्थ श्रद्धा और तदनुरूप उनका सम्यक्ज्ञान एवं सम्यक्चारित्र ( अनुपालन ) भी परमावश्यक है।
इस दृष्टि से गोम्मटसार ग्रन्थ महत्वपूर्ण है । उपयोगिता एवं सिद्धान्त प्रतिपादन की दृष्टि से वह अप्रतिम है। जैनधर्म के सिद्धान्त ग्रन्थों में उसका प्रमुख स्थान है। ऐसे महत्वपूर्ण और उपयोगी ग्रन्थ का प्रणयन उसके रचयिता आचार्य के ज्ञान- गाम्भीर्य, सूक्ष्म दृष्टि एवं वैदूष्य को स्वतः प्रकट करता है।
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