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________________ 36 जैनविद्या - 19 अपनी अत्यधिक प्रशंसा करनेवाला, दूसरे पर विश्वास नहीं करनेवाला, अपने समान दूसरों को दुष्ट समझनेवाला, स्तुति करने पर प्रसन्न होनेवाला, अपने हानि-लाभ को नहीं समझनेवाला, रण (युद्ध) में मरने की इच्छा रखनेवाला, अपनी प्रशंसा करनेवाले को धन देनेवाला और कार्यअकार्य को नहीं समझनेवाला-ये लक्षण कापोत लेश्यावाले जीव के होते हैं । पीत लेश्यावाले जीव के लक्षणों का प्रतिपादन जीवकाण्ड में निम्न प्रकार से किया गया है - जाणइ कज्जाकज्जं सेयमसेयं च सव्वसमपासी। दयदारणदो य मिदू लक्खणमेयं तु तेउस्स ॥ 515॥ अर्थात् जो कार्य-अकार्य, सेव्य-असेव्य को समझता है, सभी के ऊपर सम-भाव रखता है, जो दयाभाव रखता है और दान में तत्पर रहता है वह जीव पीत लेश्यावाला होता है। पद्म लेश्यावाले जीव के निम्न लक्षण प्रतिपादित किए गए हैं - चागी भद्दो चोक्खो उज्जुवकम्मो य खमदि बहुगंपि। साहुगुरुपूजणरदो लक्खणमेयं . तु पम्मस्स ॥ 516॥ अर्थात् पद्म लेश्यावाला जीव त्यागी (त्याग-दान करनेवाला), भद्र परिणामी (भद्र परिणामवाला), सुकार्यकारी, उद्यम करनेवाला, क्षमाशील (सहनशील), साधु और गुरुओं की पूजा में रत होता है। शुक्ल लेश्यावाले जीव के निम्न लक्षण जीवकाण्ड में बतलाए गए हैं यण कुणइ पक्खवायं णवि य णिदाणं समो य सव्वेसिं। णत्थि य रायद्दोसा गेहोवि य सुक्कलस्सस्स ॥517॥ अर्थात् जो जीव पक्षपात नहीं करता है, निदानबंध नहीं करता है, सभी जीवों में समभाव रखता (समदर्शी होता) है, इष्ट-अनिष्ट पदार्थों में राग-द्वेष से रहित तथा कुटुम्बीजनों में ममत्वरहित होता है वह शुक्ल लेश्यावाला होता है। लेश्या सम्बन्धी उपर्युक्त विवेचन जीवकाण्ड की मौलिक विशेषता है। इन्हीं लेश्यागत भावों के अनुसार यह आत्मा (जीव) आयु और गतियों का बंध करता है। जिस जीव की जैसी लेश्या होती है उसी के अनुसार उसे आयु और गति का बन्ध होता है । कृष्ण आदि छहों लेश्याओं के शुभ स्थानों में यह आत्मा जघन्य से उत्कृष्ट-पर्यन्त मन्द, मन्दतर, मन्दतम रूप से परिणमन करता है और उन्हीं के अशुभ स्थानों में उत्कृष्ट से जघन्यपर्यन्त तीव्रतम, तीव्रतर, तीव्ररूप से परिणमन करता है। इस प्रकार प्रत्येक में इन छह रूपों से हानि-वृद्धि होती रहती है। आत्मा के संक्लेश परिणामों की जैसी-जैसी न्यूनता होती है वैसे-वैसे यह आत्मा कृष्ण लेश्या को छोड़कर नील लेश्या में आता है और नील लेश्या को छोड़कर कापोत लेश्या में आता है। संक्लेश की क्रमशः वृद्धि होने पर कापोत से नील और नील से कृष्ण लेश्या में आता है। इस प्रकार संक्लेश भावों की हानि-वृद्धि से यह आत्म अशुभ लेश्याओं में परिणमन करता है। इसी प्रकार विशुद्धि की
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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