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जैनविद्या - 19 ___ अर्थात् जिस प्रकार (भरत क्षेत्र के) चक्रवर्ती ने छह खण्डों को अपने चक्ररत्न से निर्विघ्नरूप से अपने वश में किए उसी प्रकार मैंने भी (बुद्धिरूप) चक्र से छह खण्ड (जीवस्थान, क्षुद्रबंध, बंध स्वामी, वेदना खण्ड, वर्गणा खण्ड और महाबंध) रूप सिद्धान्त-शास्त्र को सम्यक्रूप से साधा (जाना) है।
सम्भवतः इसीलिए आचार्य नेमीचन्द्र विशेष उपाधि 'सिद्धान्तचक्रवर्ती' से विभूषित एवं विख्यात हुए। निःसन्देह वे अत्यन्त प्रभावशाली और सिद्धान्त-शास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान थे। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों से उनकी आगमज्ञता एवं अगाध ज्ञान-गरिमा का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ___ यद्यपि आचार्य नेमीचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती जिन्होंने सिद्धान्त-ग्रन्थों की रचना की, के विषय में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, किन्तु इतना स्पष्ट है कि वे चामुण्ड राय के समकालीन ग्यारहवीं शती के विद्वान थे। क्योंकि आचार्य नेमीचन्द्र ने चैत्रशुक्ला पंचमी, रविवार, 22 मार्च, सन् 1028 में चामुण्डराय द्वारा निर्मापित श्रवणवेलगोला में स्थापित गोम्मटस्वामी बाहुबली की अद्भुत, अप्रतिम, कलात्मक विशाल मूर्ति की प्रतिष्ठा की थी। उपलब्ध प्रमाणों से स्पष्ट है कि श्रीमन्नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती और चामुण्डराय दोनों अजितसेनाचार्य के शिष्य थे। चामुण्डराय ने नेमीचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती का भी शिष्यत्व ग्रहण किया था। मंत्री प्रवर चामुण्डराय ने आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती से भी शिक्षा ग्रहण की थी। आचार्य अजितसेन गंगवशी राजा मारसेन, काचमल्ल चतुर्थ तथा सेनापति चामुण्डराय के ही गुरु नहीं थे, अपितु कन्नड़ भाषा के सुप्रसिद्ध कविरत्न, चामुण्डराय के सुपुत्र, जिनदेवन, कनकसेन द्वितीय के भी गुरु थे। गोम्मटसार के जीवकाण्ड में अजितसेनाचार्य का उल्लेख निम्न प्रकार से किया गया है -
अज्जजसेणगुणगण समूह संधारि अजियसेण गुरु।
भुवणगुरु जस्स गुरु सो राओ गोम्मटो जयऊ । 933। अर्थात् आचार्य श्री आर्यसेन के अनेक गुणों को धारण करनेवाले तथा तीन लोक के गुरु आचार्य अजितसेन जिनके गुरु हैं वे श्री गोम्मटराय (चामुण्डराय) जयवन्त हों । चामुण्डराय की प्रेरणा से ही नेमीचन्द्राचार्य ने प्रश्नोत्तर-रूप में 'गोम्मटसार' की रचना की थी। 'गोम्मट' चामुण्डराय का घरेलू नाम था। कन्नड़ और मराठी भाषा में 'गोम्मट' शब्द का अर्थ व्यवहार उत्तम, सुन्दर, आकर्षक एवं प्रसन्न करनेवाला अर्थ में होता है। वस्तुतः 'गोम्मट' शब्द उत्तम का वाचक है और 'राय' राजा वाचक होता है । अत: गोम्मटराय का अर्थ हुआ - उत्तम राजा। चामुण्डराय वस्तुतः वीर सेनापति थे जिनके व्यक्तित्व में बाहुबल और बुद्धिबल, असि-कौशल
और आत्म-कौशल तथा प्रचण्डता और साहित्यिकता का जो विलक्षण एवं अद्भुत समन्वय लक्षित होता है वह इन आचार्यों की गुरु-कृपा का ही फल था।
प्राप्त उल्लेखों से यह सुस्पष्ट है कि श्रीमन्नेमिचन्द्राचार्य का गोम्मटराय के प्रति विशेष स्नेह, लगाव और अनुग्रह था। यह भी सम्भव है कि गुरुभाई होने के नाते वे गोम्मटराय को विशेष सम्मान देते हों। क्योंकि उनके द्वारा लिखित ग्रन्थ 'गोम्मटसार' में गोम्मटराय के नाम की प्रधानता