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________________ जैनविद्या - 19 है जिसका अभिप्रेतार्थ गोम्मट के लिए खींचा गया पूर्व के षट्खण्डागम तथा धवला आदि ग्रन्थों का सार है, जैसा कि कर्मकाण्ड की निम्न गाथा से स्पष्ट है गोम्मट - संगहसुत्तं गोम्मटसिंहरुवारि गोम्मट जिणो यो । गोम्मटराय विणिर्मिमय दक्खिण कुक्कुडजिणो जयऊ ॥ 968 ॥ अर्थात् गोम्मटराय के लिए ( प्रेरणा रूप से) लिखा गया यह गोम्मट संग्रह सूत्र (गोम्मटसार ग्रन्थ या पंच संग्रह), गोम्मट - शिखर या चन्द्रगिरि पर स्थापित मन्दिर में नेमिनाथ भगवान की एक-हस्तप्रमाण इन्द्रनीलमणि की प्रतिभा एवं दक्षिण कुक्कुट जिन- बाहुबलि की विशालकाय प्रसिद्ध मूर्ति - ये सदा जयवन्त हों । 31 मचन्द्राचार्य की उपर्युक्त गाथा से यह सुस्पष्ट है कि वे गोम्मटराय को सदा-सदा के लिए स्थायीरूप से तीन महान कार्यों के लिए अमर घोषित कर गए। वस्तुतः इन्हीं तीन कार्यों में चामुण्डरा की ख्याति है । 1. गोम्मट संग्रह सूत्र का अर्थ है - गोम्मट के लिए किया गया साररूप संग्रह ग्रंथ जिसका नाम है - 'गोम्मटसार' । 2. 'गोम्मट - जिन' से अभिप्राय है नेमिनाथ भगवान की एक हाथप्रमाण इन्द्रनीलमणि की प्रतिमा जिसे गोम्मटराय (चामुण्डराय) ने बनवाकर गोम्मटशिखर - चन्द्रगिरि पर स्थित अपने मंदिर में स्थापित किया था, जिसके सम्बन्ध में कहा जाता है कि पहले चामुण्डराय वसति में विद्यमान थी। 3. 'दक्षिण कुक्कुट जिन' भगवान बाहुबली की उस विशाल एवं प्रसिद्ध मूर्ति का ही नामान्तर है जो श्रवणबेलगोल में स्थापित है। यह मूर्ति दक्षिण भारत में अवस्थित है और तपश्चरण के दौरान कुक्कुट - सर्पों, व्याल - लताओं से वेष्टि होने के कारण 'कुक्कुट जिन' कहलाती है । चामुण्डराय उनके परम भक्त थे और भगवान बाहुबली उनके ईश्वर थे। अतः वे 'गोम्मटेश्वर ' कहलाते हैं । श्रीमन्नेमिचन्द्राचार्य ने स्वयं को आचार्य अभयनन्दी का शिष्य बतलाया है । अभयनन्दी मूलसंघ देशीयगण के थे, वे उस समय के उच्चकोटि के सैद्धान्तिक विद्वान थे। निम्न गाथा से उनके इस कथन की पुष्टि होती है इदि नेमिचंद मुणिणा अप्पसुदेणभयणंदि वच्छेण । रइयो तिलोयसारो खमंतु तं बहुसुदाइरिया ।।1018 ॥ मचन्द्र के अतिरिक्त वीरनन्दी और इन्द्रनन्दी भी इनके शिष्य थे। ये दोनों नेमिचन्द्र के ज्येष्ठ गुरु भाई थे। इसलिए इन्होंने उन दोनों को गुरुतुल्य मानकर उन्हें नमस्कार किया है और स्वयं को उनका शिष्य बतलाया है। इसका प्रतिपादन गोम्मटसार, कर्मकाण्ड में निम्न प्रकार से किया है - णमिण, अभयदि सुद- सायर पारगिंदणंदि गुरुं । वरवीरणंदिणाहं पयडीणं पच्चयं वोच्छं ॥ 785 ॥ णमह गुणरसणभूसण सिद्धंतामित्य महद्धि भवभावं । वरवीरणंदिचंदं णिम्मलगुणमिंदणंदि गुरुं ॥ 897৷
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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