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जैनविद्या - 19
अप्रेल
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1997-1998
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सिद्धान्त - शास्त्र - मर्मज्ञ नेमीचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती
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आचार्य राजकुमार जैन
दिगम्बराचार्य नेमीचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती जैन जगत के उन देदीप्यमान नक्षत्रों में हैं जिन्होंने अपने ज्ञानालोक से जैन सिद्धान्तों के गूढ़तम विषयों को अपनी लेखनी से न केवल विवेचित किया, अपितु उनके रहस्यों एवं सूक्ष्मत्व को प्रकटकर उनकी गहनता को स्पर्श करते हुए उन्हें भावी पीढ़ी के सम्मुख प्रस्तुत किया। जैन सिद्धान्तों, उनकी सूक्ष्मता एवं रहस्यमयता की विवेचना कोई सामान्य बात नहीं है। जैन सिद्धान्तों का पारगामी, मर्मज्ञ एवं तलस्पर्शी ज्ञानवान् व्यक्ति ही सिद्धान्त - विषयों की विवेचना में समर्थ हो सकता है। नेमीचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती का वैदूष्य एवं पाण्डित्य उनकी कृतियों से स्वतः स्पष्ट है । उनके द्वारा रचित गोम्मटसार ( जीवकाण्ड एवं कर्मकाण्ड) की गहनता इसका सुपुष्ट प्रमाण है। इस ग्रन्थ के सदृश कोई दूसरा ग्रन्थ उनके पूर्ववर्ती या परवर्ती आचार्यों द्वारा नहीं रचा गया। इस ग्रन्थ की विषय-प्रवणता एवं विवेचनशीलता अप्रतिम है। प्रतिपाद्य विषय-वस्तु भी उस रूप में अन्यत्र दुर्लभ है। आचार्य नेमीचन्द्र ने अपने बोध (ज्ञान) का संदर्शन निम्न रूप में किया है -
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जह चक्केण य चक्की छक्खण्डं साहियं अविग्घेण ।
तह मइ चक्केण मया छक्खण्डं साहियं सम्मं ॥ 397 ।। गो.क.