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________________ 26 जैनविद्या - 19 सम्यग्ज्ञान चंद्रिका करणानुयोग के दोनों ग्रन्थों की कर्णाटक एवं संस्कृत भाषा की टीकाओं के आधार पर आचार्यकल्प पं. टोडरमलजी जयपुर ने उक्त ग्रन्थों की अर्थ-संदृष्टि सहित देश-भाषा टीका बनायी। जिसका नाम 'सम्यग्ज्ञान चंद्रिका' रखा। जटिल, सिद्धांत ग्रन्थ की यह अद्भुत टीका है जिसके शास्त्राभ्यास करने की प्रेरणा पं. टोडरमलजी ने पीठिका में की है। उनके अनुसार शास्त्राभ्यास से सम्यग्ज्ञान होता है और आनंद मिलता है, जो मोक्ष का कारण है। त्रिलोकसार आचार्य नेमिचंद्र की यह तृतीय कृति जैन-दर्शन के लोकानुयोग साहित्य से सम्बन्धित है जिसमें भूगोल-खगोल, ज्योतिष निमित्त एवं ग्रह-गणित आदि का विस्तृत विवरण दिया है । नाम के अनुरूप इस ग्रन्थ में तीन लोक अर्थात् ऊर्ध्वलोक, मध्यलोक और अधोलोक का वर्णन 1018 गाथाओं में किया है। आचार्यश्री के शिष्य माधवचन्द्र त्रैविधदेव ने इसकी संस्कृत टीका लिखी, साथ ही अपने गुरु की सहमति से त्रिलोकसार में यत्र-तत्र कुछ गाथाओं की रचना भी की। इसमें छह अधिकार हैं - लोक सामान्य, भावन लोक, व्यंतर लोक, ज्योतिर्लोक वैमानिकलोक और नरतिर्यगलोक। __ प्रथम लोक सामान्य में मंगल निमित्त की चर्चा है, तथा श्रेणि के धन प्रमाण का निर्णय करने के लिए प्रमाणों का कथन है। भाव दो प्रकार का है - लौकिक और लोकोत्तर । लौकिक के छः भेद हैं और लोकोत्तर के चार-द्रव्य-क्षेत्र-काल और भाव । द्रव्यप्रमाण के दो भेद हैं - संख्या और उपमा। संख्या प्रमाण की चौदह धाराओं का कथन किया है। धाराओं का विस्तृत ज्ञान जानने के लिए आचार्य कुन्दकुन्द कृत 'परिकर्म' का उल्लेख किया है। इसके बाद उपमा प्रमाणों का कथन है। पश्चात् अधोलोक और उर्ध्वलोक का कथन है। अधोलोक में सात नरक-पृथ्वियों और नारकियों की जानकारी दी है। द्वितीय भावन लोक अधिकार में भवनवासी देवों के भेद, उनके इंद्र, परिवार, चैत्य वृक्ष, आयु आदि का विस्तृत वर्णन दिया है। तीसरे व्यंतर लोक में व्यंतर देवों के भेद, शरीर, वर्ण, चैत्य वृक्ष, इंद्रों के नाम, परिवार, देव और आयु आदि का वर्णन है। __चौथे ज्योतिर्लोक में ज्योतिषी देवों के पाँच भेदों का कथनकर 16 द्वीप एवं 16 समुद्रों का वर्णन किया है। पश्चात् ज्योतिर्विमानों का स्वरूप, चंद्रमा-सूर्य की संख्या, ताराओं की संख्या, चंद्र-सूर्य के चार क्षेत्र, दिन-रात की हानि-वृद्धि, नक्षत्रों के नाम तथा ज्योतिष्क देवों-देवियों की आय का वर्णन है। ___ पाँचवें वैमानिक लोक में कल्प-कल्पातीत विमानों की जानकारी देकर सोलह स्वर्गों में विमानों की संख्या, इंद्रक विमानों का प्रमाणादि, सामाजिक देवों की संख्या, कल्पों में स्त्रियों की उत्पत्ति-स्थान, प्रविचार विक्रिया, अवधिज्ञान का विषय, लोकांतिक देवों का स्वरूप, देवांगनाओं की आयु आदि का वर्णन किया है। अंत में सिद्ध जीवों का कथन किया है। - छठे नर-तिर्यगलोक में जंबूद्वीप के भरत-ऐरावत क्षेत्रों, पर्वतों, पद्म आदि हृदों और उनसे निकलनेवाली नदियों, मेरु पर्वत तथा भद्रशाल वनों का वर्णन है । पश्चात् जंबू वृक्ष, भोग-भूमि,
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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