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________________ जैनविद्या 19 और कर्म भूमि आदि विदेह क्षेत्रों का वर्णन है। विदेह क्षेत्र में तीर्थंकर आदि शलाका पुरुष सदैव विद्यमान रहते हैं । अतः उनकी संख्या, चक्रवर्ती की संपति, राजा का लक्षण आदि बताया है। 27 पश्चात् भरत और ऐरावत क्षेत्र के छह कालों के परिवर्तन का विस्तार से वर्णन किया है। इन कालों में जीवों की आयु, शरीर रचना, रंग आदि तथा 63 शलाका पुरुषों का वर्णन है । कल्की और अर्धकल्की के अत्याचारों का वर्णन सविस्तार करके इक्कीसवें कल्की के अत्याचारों से धर्म, राजा और अग्नि का अंत बताकर इस काल का अंत बताया है । पश्चात् उत्सर्पिणी काल के प्रारम्भ का वर्णन एवं 14 कुलकरों की उत्पत्ति आदि का वर्णन किया है। जैन भूगोल के अनुसार आकाश के मध्य में लोक माना जाता है। जितने आकाश में जीव और पुद्गल आदि का आवास है वह लोक है, शेष अलोक है। लोक के निम्न तीन भाग है। (1) अधोलोक में रत्नप्रभा आदि सात नरक पृथ्वियाँ हैं । रत्नप्रभा के तीन भाग हैं - खरभाग, पंक भाग और अब्बहुल भाग । प्रथम दो भाग में भवनवासी और व्यंतर देव रहते हैं, तीसरे भाग में प्रथम नरक है । सात नरकों में 84 लाख बिल हैं, जिनमें नारकी रहकर अनंत दुःख भोगते हैं। (2) मध्यलोक तिर्यग्लोक कहलाता है। इसमें असंख्यात द्वीप- समुद्र हैं। मध्य में जंबूद्वीप है। उसके चारों ओर लवण समुद्र है। उसके बाद घातकीखण्ड द्वीप है और कालोदधि समुद्र है । इस प्रकार एक के बाद एक द्वीप और समुद्र हैं। अंतिम द्वीप और समुद्र का नाम स्वयंभूरमण है। जम्बूद्वीप के मध्य में सुमेरु पर्वत है । जम्बूद्वीप, विदेह क्षेत्र एवं सुमेरु पर्वत आदि का वर्णन है। इसमें मनुष्य और तिर्यंचों का आवास है | (3) ऊर्ध्वलोक में सोलह स्वर्ग हैं। जहाँ देवी-देवताओं एवं इंद्रों का आवास है। इसके बाद कल्प, नव ग्रैवेयक, नव अनुदिश, पंच अनुत्तर और लोक के ऊपर अग्र भाग में सिद्धलोक है। 'द्रव्य संग्रह ' नामक ग्रन्थ भी आचार्य नेमिचन्द्र की रचना मानी जाती है। किन्तु 'द्रव्य संग्रह ' की विषय-सामग्री, प्रतिपादन की शैली आदि को दृष्टिगत कर ऐसा प्रतीत होता है कि इस ग्रन्थ के कर्त्ता गोम्मटसार के कर्त्ता आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धांतचक्रवर्ती न होकर कोई अन्य मुनिराज सिद्धांतदेव नेमिचंद्र हैं। ऐसा पं. जुगलकिशोरजी मुख्तार एवं अन्य विद्वानों का मत है। इस ग्रन्थ बृहद संस्कृत टीका ब्रह्मदेव द्वारा की गई है। संक्षेप में, सिद्धांतचक्रवर्ती नेमिचंद्र अपने समय के करणानुयोग के पारगामी, निरंतर अभ्यासशील, आत्मस्वरूप में रमण करनेवाले, निश्छल, अति गुणग्राही, निःसंकोची एवं तत्त्वमर्मज्ञ आचार्य थे जिनके कर्तृत्व से जैनदर्शन का कर्म-निमित्तक आगम- साहित्य सदैव ऋणी रहेगा। निर्मल परिणामी महानुभाव, एकान्तिक मिथ्यामतों को त्यागकर स्यादवाद मुद्रित जिनवाणी में वर्णित महासत्ता की स्वचालित व्यवस्था स्वीकारते हुए जीव-कर्म-सम्बन्धों के दुरुह - जटिल अनादि-जाल को शुद्धात्मा के ध्यान द्वारा तोड़कर परमात्मा बनेंगे, यही भावना है। बी-369 ओ. पी. मिल्स कॉलोनी अमलाई 484117 (म.प्र.) -
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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