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________________ 25 जैनविद्या - 19 पहला अधिकार दर्शन-लब्धि का है, जिसमें प्रथमोपशम सम्यक्त्व, पाँच लब्धियाँ, तीन करणों का स्वरूप, उनके चार आवश्यक, अल्प-बहुत्व तथा चारों गतियों में उपशम सम्यक्त्व की प्राप्ति का विधान गाथा 1 से 109 तक किया है। द्वितीय अधिकार में क्षायिक सम्यक्त्व, अंतः काण्डक का विधान, दर्शन-मोहनीय की क्षपणा के 33 अल्प-बहुत्व के स्थान एवं क्षायिक सम्यक्त्व के माहात्म्य का वर्णन गाथा110 से 167 तक किया है। अनंतानुबंधी क्रोधादि 4 कषाय एवं दर्शन मोह की 3 - कुल 7 प्रकृतियों के क्षय से उत्पन्न क्षायिक सम्यक्त्व निर्मल, अक्षय होता है। ऐसा जीव उसी भव में अथवा तीसरे/चौथे भव में मोक्ष जाता है। ये दो अधिकार दर्शन लब्धि के हैं। तीसरा अधिकार चारित्र लब्धि का है, जिसमें गाथा संख्या 168 से 204 तक देश-चारित्र, सकल-चारित्र और उसके भेद तथा परिणामों की विशुद्धता आदि का वर्णन किया है। सकलचारित्र तीन प्रकार का है - क्षायोपशमिक, औपशमिक और क्षायिक। क्षायोपशमिक चारित्र सातवें/छठे गुणस्थान में होता है । यह उपशम सम्यक्त्व या वेदक सम्यक्त्व सहित होता है । म्लेच्छ भूमि के मनुष्य भी आर्य मनुष्यों के समान सकल चारित्र धारण करने के पात्र हैं। चौथा अधिकार चारित्रोपशमना अधिकार है। जिसमें उपशम चारित्र अर्थात् उपशांतकषाय-वीतराग का वर्णन गाथा 205 से 391 तक है। अध:करण आदि आठ अधिकारों द्वारा चारित्र मोह के उपशम का विधान वर्णित है। तीन करण का विधान एवं बंधापसरणादि का स्वरूप और उपशम श्रेणी चढ़नेवाले बारह प्रकार के जीवों की क्रिया का वर्णन किया है। वेदक सम्यग्दृष्टि जीव क्षायोपशमिक चारित्र धारणकर जब औपशमिक चारित्र धारण करता है, तब वह क्षायिक सम्यक्त्व या द्वितियोपशम सम्यक्त्व धारण करता है । चारित्र मोह का उपशम करने पर जीव ग्यारहवें गुणस्थान में अंतरमुहूर्त तक रहता है बाद में पतन हो जाता है। ... पाँचवाँ अधिकार क्षपणासार है जिसमें चारित्र मोहनीय कर्म के क्षय, तीन करणों का स्वरूप और उनकी भूमिका, स्थिति बंधापसरण, कषायक्षपणा, सूक्ष्म-बादर कृष्टियाँ आदि के अंतर्गत गाथा 392 से 510 तक वर्णन किया है। छठा-कृष्टि वेदना अधिकार है जिसमें गाथा 511 से 653 तक कृष्टि वेदन का क्रम, संक्रमण, द्रव्य और बंध, द्रव्यादि का विधान, सूक्ष्म-सांपराय, सयोग-अयोग केवली और सिद्धों के स्वरूप का वर्णन है। चारित्र मोह का क्षय होने पर जीव बारहवें गुणस्थान क्षीणमोह में पहुँचता है। पश्चात् ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अंतरायकर्म क्षय कर तेरहवें गुणस्थान में सर्वज्ञ/सर्वदर्शी हो जाता हैं । यहाँ अन्तर्मुहूर्त आयु शेष रहने पर विहित प्रक्रिया द्वारा, तीसरे शुक्ल ध्यान के द्वारा सर्व कर्म क्षयकर अयोग केवली हो जाता है । छ: माह आठ समय में 608 जीव निगोद से निकलते हैं और इतने ही जीव सिद्ध होते हैं। ___ सर्वज्ञ-कथित सभी संसारी जीवों के साथ कर्म-बंध, कर्म-उदय एवं कर्म क्षय की यह क्रिया-प्रक्रिया अनादि काल से निर्बाध बिना किसी हस्तक्षेप या भेदभाव के स्वचालित-व्यवस्था के रूप में चल रही है। यह तो अज्ञानी संज्ञी जीवों का उत्पात है जो महासत्ता की इस व्यवस्था में अपने मोहराग-द्वेष के भावों के अनुसार हस्तक्षेप करने का विकल्प करते हैं । इसी विकल्प से छूटने का उपाय लब्धिसार में वर्णित है।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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