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जैनविद्या
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हैं, कर्मों के उदय से निरपेक्ष पारिणामिक भाव होते हैं, वे तीन हैं जीवत्व, भव्यत्व, और अभव्यत्व। यह परम पारिणामिक भाव अनादि से जैसे हैं तैसे ही हैं। इस प्रकार पाँच मूल भावों
53 भेद हैं और भंग विकल्पों की दृष्टि से बहुत हैं। इन भावों का और उनके स्व-संयोगी, बहुसंयोगी भंगो का गाथा सं. 811 से 895 तक में कथन किया है। परम-पारिणामिक भावों का आश्रय लेकर क्षायोपशमिक भावों के द्वारा उपशम / क्षायिक भाव प्राप्त होते हैं और औदयिक भावरूप दुख से मुक्ति मिलती है अतः भावों का स्वरूप और उनका महत्व समझना मोक्षमार्ग में अनिवार्य है।
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इसमें 180 क्रियावादी, 84 अक्रियावादी, 67 अज्ञानवादी और 32 वैनयिकवादी - कुल 363 मिथ्यामतों का भी सविस्तार वर्णन किया है। अंत में यह घोषणा की है कि जितने वचनमार्ग हैं। उतने ही नयवाद हैं और जितने नयवाद हैं उतने ही पर समय है। स्यादवाद रूप सभी नय-समूहों का नाम जैनदर्शन है ।
8. त्रिकरण चूलिकाधिकार - करण भाव को कहते हैं। करण तीन हैं - अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण । अनंतानुबंधी चार कषायों के अलावा शेष चारित्र मोहनीय की 21 कर्म प्रकृतियों का क्षय या उपशम इन तीन करणों के कारण ही होता है। अधः प्रवृत्तकरण में ऊपर के समय के भाव नीचे के समय संबंधी भावों के समान होते हैं । यह भाव सातिशय अप्रमत्त गुणस्थानवाले जीव के होते हैं। प्रत्येक समय में होनेवाले अपूर्व भावों को अपूर्वकरण कहते हैं । अनिवृति करण में विवक्षित समय में भेदरहित सुनिश्चित समान भाव होते हैं। इन तीनों करणों से अनंतगुनी विशुद्धि होती है उनका काल अन्तरमुहूर्त्त मात्र है। तीनों करणों के स्वरूप वर्णन गाथा 896 से 912 तक अंक संदृष्टि द्वारा समझाया गया है । यह उल्लेखनीय है कि इन करणों के पुरुषार्थ से ही सम्यक्त्व होता है
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9. कर्मस्थिति रचना अधिकार जीव के भावों के अनुसार प्रति समय कर्मबंध होकर, उनका आठ कर्मों में विभाजन होता है, तदनुसार प्रत्येक कर्म के निषेकों की रचना होकर आबाधा काल के बाद कर्म उदय में आना शुरू हो जाते हैं और स्थितिपर्यंत खिरते रहते हैं । कर्मस्थिति की रचना का वर्णन गाथा क्रमांक 913 से 972 तक, ग्रन्थ की प्रशस्ति - सहित किया गया है। 1 इसमें द्रव्य, स्थिति, गुण-हानि, नाना गुण-हानि आदि का स्वरूप अंक संदृष्टि की अपेक्षा किया गया है । ग्रन्थ के अंत में आचार्य नेमिचन्द्र ने बहुमुखी प्रतिभा के धनी, अपने शिष्य चामुण्डराय के कर्तृत्व की प्रशंसा कर उनके जयवंत होने की कामना की ।
लब्धिसार-क्षपणासार
यह आचार्य नेमिचन्द्र की दूसरी कृत्ति है जो गोम्मटसार का उत्तर भाग समझना चाहिए। गोम्मटसार के जीवकाण्ड में जीव के स्वरूप का और कर्मकाण्ड में जीव के द्वारा बांधे जानेवाले कर्मों का वर्णन है। लब्धिसार में जीव के कर्म-बंध से छूटने की प्रक्रिया अर्थात् लब्धिरूप सम्यग्दर्शन और सम्यक-चारित्र की उपलब्धि की प्रक्रिया सविस्तार दर्शायी है । इसमें 653 गाथाएँ हैं, जो छः अधिकारों में विभक्त हैं ।