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जैनविद्या - 19
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उत्तर प्रत्यय
जीव-समास और मार्गणा की अपेक्षा कथन किया है, जैसे बंध में उदय सत्व, उदय में बंध और सत्व और सत्व में बंध और उदय। बाद में दो भंगों को आधार और एक को आधेय बनाकर कथन किया है। प्रसंगवश अन्य अनेक विषयों की भी जानकारी दी है।
6. प्रत्ययाधिकार (आश्रवाधिकार)- आत्म-प्रदेशों में कर्मों के आगमन एवं कर्मबंध के कारणों को प्रत्यय कहा जाता है । मूल आश्रव चार हैं - मिथ्यात्व, अविरत, कषाय और योग। एकांत, विनय, संशय, विपरीत और अज्ञान ये मिथ्यात्व के पाँच भेद हैं । पाँच इंद्रिय और मन की स्वच्छंदता तथा पाँच स्थावर एवं त्रस जीवों की अदया-ये 12 भेद अविरत के हैं। अनंतानुबंधी क्रोधादि सोलह कषाय; हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा तीन वेद - ये नौ-नोकषायइस प्रकार पच्चीस कषायें हैं। योग के 15 भेद हैं - चार मनोयोग, चार वचन योग और सात काय योग। इस प्रकार आश्रव के 56 भेद हैं । गुणस्थानों में पाये जाने वाले मूल प्रत्यय, उत्तर प्रत्ययों का उदय, अनुदय प्रत्यय एवं व्युच्छिति का विवरण इस प्रकार है - गुणस्थान मिथ्या. सासा. | मिश्र| अवि. देश. प्रम. अप्र. अपूर्व. अनि. सू.सा. उपमो. क्षीणमो. सयोग अयोग मूल प्रत्यय- | 4 | 3 | 3 | 3 | 3 | 2 2 2 2 | 2 | 1 | 1 उत्तर प्रत्यय-| || || | ||| | | प्रत्ययों का उदय | 55 | 50 | 43 46 37 ] 24 22| 22| 10से16| 10| १ | १ | 7 | 0 | अनुदय प्रत्यय - 2 714 |11 20 | 33 35| 35| 41से47| 47 48 48 | 0 | 57 | प्रत्यय-व्युच्छिति 540915 | 2016 4104701
(उपचार से) इस प्रकार गाथा 785 से 810 तक गुणस्थानों में मूल और उत्तर प्रत्ययों और उनके भंगों का भी कथन किया है। किन-किन परिणामों से कौन-कौन से कर्मों एवं आयु का बंध होता है, इसका वर्णन भी किया है, ताकि आत्मार्थी-जन परिणामों के प्रति निरंतर जागरूक रह सकें। जो जीव अरहंत, सिद्ध, प्रतिमा, तप, जैन शास्त्र, गुरु और संघ के प्रतिकूल होकर उनके स्वरूप को विपरीत रूप से ग्रहण करता है उसे दर्शन मोह का बंध होता है। मिथ्यात्व, लोभ एवं रौद्र परिणामों से नरक आयु का बंध होता है। मिथ्यात्व और मायाचार से तिर्यंच गति का बंध होता है। मंद कषाय, दान, शील, संयम एवं मध्यम गुणों से मनुष्य आयु का बंध होता है। सम्यक्त्व, अणुव्रत एवं महाव्रत से देवायु का बंध होता है। मिथ्यादृष्टि जीव भी अकाम निर्जरा कर देवायु का बंध करता है। शुभ-अशुभ कर्मों का बंध भी परिणामों/भावों के अनुसार होता है। - 7. भाव चूलिका अधिकार - 'भवनं भवतीति भावः' होना मात्र या जो होता है, सो भाव है। चेतन के परिणाम को भाव कहते हैं । जीव द्रव्य की अपेक्षा उनके पाँच भाव हैं - औपशामिक क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक और पारिणामिक भाव। प्रतिपक्षी कर्म के उपशम से उत्पन्न होनेवाले सम्यक्त्व और चारित्र औपशमिक भाव हैं। कर्मों के क्षय से उत्पन्न होनेवाले ज्ञानावर्णादिक नौ भाव क्षायिक भाव हैं। कर्मों के क्षमोपशम से उत्पन्न होनेवाले मतिज्ञानादि 18 भाव क्षायोपशमिक भाव हैं । कर्मों के उदय से उत्पन्न होनेवाले रागादि इक्कीस भाव औदयिक