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जैनविद्या - 19
54 प्रकृतियाँ निरंतरबंधी हैं, (8) नरकगति आदि 34 प्रकृतियाँ सान्तरबंधी हैं तथा (7) सांतर निरंतर बंधी 32 प्रकृतियाँ हैं ।
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(ब) पाँच भागाहार चूलिका परिणामों के निमित्त से शुभ के अशुभरूप संक्रमण को भागाहार कहते हैं । यह संक्रमण अपनी ही प्रकृति में होता है। मोहनीय और आयु कर्म को छोड़कर यह संक्रमण उत्तर प्रकृतियों में ही होता है जैसे- साता का असाता में और असाता का साता में । भागाहार पाँच प्रकार का होता है - उद्वेलन, विध्यात, अधः प्रकृत, गुणसंक्रमण और सर्व संक्रमण। इनका स्वरूप गुणस्थानों के संदर्भ में किस-किस कर्म - प्रकृति में कौन-कौन भागाहार (संक्रमण) सम्भव है, और किस-किस भागाहार के अंतर्गत कौन-कौन प्रकृतियाँ है इसका वर्णन किया है।
(स) दशकरण चूलिका - करण का अर्थ अवस्था से है। करण दस होते हैं - (1) बंध, (2) उत्कर्षण, (3) संक्रमण, (4) अपकर्षण, (5) उदीरणा, (6) सत्व, (7) उदय, (8) उपशम, (9) निधत्ति और (10) निकाचना । इस चूलिका में इनका स्वरूप, कर्म प्रकृतियों और गुणस्थानों में इनके अस्तित्व आदि का सविस्तार वर्णन किया है। कर्म-बंध आदि की उक्त क्रियाएँ परिणामों पर निर्भर करती है, जो जीव की स्वतंत्रता एवं स्वाधीनता का परिचायक है ।
5. बंध-उदय-सत्वरहित स्थान समुत्कीर्तन अधिकार - इस अधिकार में आठ कर्मों की उत्तर प्रकृतियों के बंधस्थान, उदय स्थान और सत्व स्थान का विस्तृत कथन गाथा 451 से 784 तक किया है। तीसरे गुणस्थान के अलावा छठे गुणस्थान तक आयु को छोड़ शेष 7 कर्मों या आयु सहित आठ कर्मों का बंध होता है। तीसरे, आठवें एवं नौवें गुणस्थानों में आयु के अतिरिक्त शेष सात कर्मों का बंध होता है। दसवें गुणस्थान में आयु और मोहनीय के अतिरिक्त 6 कर्मों का बंध होता है। ग्यारहवें, बारहवें एवं तेरहवें गुणस्थान में एक वेदनीय कर्म का ही बंध होता है। अयोगी में बंध नहीं होता ।
सूक्ष्म सांपराय (10वें) गुणस्थान तक आठों मूल प्रकृतियों का उदय है । उपशांत और क्षीण कषाय गुणस्थान में मोह बिना सात कर्मों का उदय है । सयोगी अयोगी में चार अघातिया कर्मों का उदय है। उपशांत कषाय गुणस्थान तक आठों मूल प्रकृतियों का उदय है । उपशांत-कषाय गुणस्थान तक आठों मूल प्रकृतियों का सत्व है। क्षीण - कषाय में मोह को छोड़कर शेष सात काही सत्व है और सयोगी अयोगी में चार अघातिया का सत्व है। इस प्रकार आठों कर्मों के आठवाँ, सातवाँ, छठा और पहला गुणस्थान बंध-स्थान है। आठवें, सातवें और चौथा गुणस्थान उदय स्थान तथा आठवाँ, सातवाँ और चौथा ये तीन सत्व स्थान हैं ।
आठों कर्मों के बारे में बंध, उदय और सत्व का वर्णन गुणस्थान के अंतर्गत किया है। वेदनीय, आयु और गोत्र कर्म की उत्तर प्रकृतियों में एक जीव के एक समय में एक ही प्रकृति का बंध और उदय होता है। ज्ञानावरण और अंतराय की पाँच प्रकृतियों का एकसाथ बंध, उदय और सत्व होने से एक स्थान है। शेष दर्शनावरण, मोहनीय और नाम कर्म के बंध, उदय और सत्व स्थानों का सूक्ष्म वर्णन किया है। पश्चात् बंध, उदय और सत्व का त्रिसंयोगी भंग बनाकर