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________________ जैनविद्या - 19 17 कर्मों की उदय-व्युच्छिति होती है। अन्य गुणस्थानों में भी ऐसी व्यवस्था है। संज्ञी तिर्यंच देश-व्रती हो सकते हैं। जिनेन्द्र देव के असाता के निमित्त से 11 क्षुधादिक परिषह होते हैं, किन्तु मोह कर्म के अभाव के कारण उदय मिष्ट जल में एक खारी द जैसा अकार्यकारी होता है। कर्मों का सत्व या सत्ता - सत्व का अर्थ कर्मों की सत्ता या अस्तित्व में रहने से है। जब तक बंधे हुए सब कर्म उदय में आकर झड़ नहीं जाते तब तक सत्ता में बने रहते हैं, इसे सत्व कहते हैं । सत्व-असत्व की प्रकृति का वर्णन एवं किस गुणस्थान एवं मार्गणा-स्थान में कितने कर्मों की सत्ता बनी रहती है, और सत्व-व्युच्छिति आदि का वर्णन गाथा 333 से 357 तक किया है। पहले, चौथे गुणस्थान में 148 कर्मों की सत्ता है। दूसरे में 145, तीसरे-पांचवें में 147, छठेसातवें में 146, आठ से ग्यारह तक 142, बारहवें में 101 और तेरहवें-चौदहवें गुणस्थान में 85 कर्मों की सत्ता रहती है। कर्मों के फल देने के पूर्व ही उनका पूर्णतया नष्ट हो जाना उद्वेलन है। इंद्रिय और काय मार्गणा में कर्म प्रकृतियों की उद्वेलना का भी वर्णन है। 3. सत्व स्थान-भंगाधिकार - यह अधिकार 'सत्व-स्थान' और भंग शब्द से बना है। किसी एक काल में किसी जीव के जितनी कर्म-प्रकृतियाँ सत्ता में पायी जाये, उस कर्म-समूह का नाम 'सत्व स्थान' है। उस सत्व स्थान में एक-सी समान संख्या पाये जाने पर कर्म-प्रकृतियों में अंतर हो तो उसे भंग कहते हैं। जैसे 145 कर्म प्रकृतियाँ सत्ता में रहते हुए आयु, मनुष्य या देव हो सकती हैं। यहाँ सत्व स्थान एक होने पर भी दो भंग हुए। प्रत्येक गुणस्थान में कर्म प्रकृतियों का सत्व-स्थान कितने प्रकार से सम्भव है और उसके साथ जीव किस आयु को भोगता है, बद्धायु-अबद्धायु आदि का वर्णन गाथा 358 से 397 तक किया है। पहले से तीन गुणस्थान में क्रमशः 18, 4 और 8 सत्व स्थान है। चौथे से सातवें तक 40-40 सत्व स्थान हैं । आठ से दसवें गुणस्थान तथा ग्यारहवें गुणस्थान में 24-24 सत्व स्थान हैं। क्षपक श्रेणी की अपेक्षा आठवें से चौदहवें गुणस्थान तक 36, 4, 8, 46 सत्व स्थान हैं। इन गुणस्थानों में सत्व स्थान के क्रमशः 50, 12, 36, 120, 48, 40, 40, 28, 62, 28, 24, 8, 4, 8 भंग होते हैं । आचार्य कहते हैं - जो कर्मों के सत्व स्थान को पढ़ेगा, सुनेगा और चिंतवन करेगा वह अवश्य मोक्ष सुख पावेगा। ___4. त्रिचूलिका अधिकार - कहे या न कहे अर्थ का चिंतवन करना चूलिका कहलाता है। इस अध्याय में गाथा 398 से 450 तक निम्न तीन बिंदुओं पर विचार किया है : (अ) नौ प्रश्न चूलिका - यथा - (1) उदय व्युच्छिति (अभाव) के पहले आठ कर्म प्रकृतियों की बंध व्युच्छिति होती है, (2) 31 प्रकृतियों की उदय व्युच्छिति और बंध व्युच्छिति एक काल में होती है, (3) शेष 81 प्रकृतियों की उदय व्युच्छिति के पहले बंध व्युच्छिति होती है, (4) देवायु आदि 11 प्रकृतियों का.पर के उदय से बंध होता है । मित्यात्व आदि 27 प्रकृतियों का बंध अपने उदय में होता है, (6) शेष 81 प्रकृतियाँ उभयबंधी हैं, (7) ज्ञानावरणादि
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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