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________________ जैनविद्या - 19 आयु, नाम, गोत्र और अंतराय । इनकी 148 उत्तर प्रकृतियाँ हैं। इनमें 5 ज्ञानावरण, 9 दर्शनावरण, 28 मोहनीय और 5 अंतराय कर्म जीवों में ज्ञान - दर्शन आदि गुणों के प्रकट होने में बाधक होने कारण ये 47 कर्म प्रकृतियाँ घातिया हैं । 4 आयु, 93 नाम, 2 गोत्र और 2 वेदनीयकर्म जीव उक्त गुणों को नहीं घातते, अतः ये 101 कर्मप्रकृतियां अघातिया हैं । इन कर्मों के अपनेअपने स्वभावानुसार आत्मा के गुणों को प्रकट न होने देने और सुख-दुःख की बाह्य सामग्री आदि उपलब्ध कराने का कार्य है, जो मोही जीव को संसार भ्रमण कराता है। जब यह जीव पुरुषार्थपूर्वक मति, श्रुत, अवधि, ज्ञानादिक, क्षायोपशमिक गुणों का आश्रय करता है तो केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, एवं दानादिक पाँच लब्धियाँ प्रकट हो जाती हैं। आत्मा का ज्ञान गुण प्रधान होने से ज्ञान को सबसे पहले कहा गया है। 18 कर्म के उदय से उत्पन्न मोह अर्थात् अज्ञान, असंयम और मिथ्यात्व से संसार बढ़ता ही जा रहा है, जीव का चार गतियों में अवस्थान आयु कर्म के उदय से होता है। परिपाटी से चले आए आचरण को गोत्र कहते हैं - उच्च आचरण को उच्चगोत्र और निम्न आचरण को नीच गोत्र/ इंद्रियों द्वारा विषयों का सुख-दुख आदि का अनुभव करना वेदनीय है। सामान्य अवलोकन दर्शन है, जानना ज्ञान है, श्रद्धान सम्यक्त्व है - ये जीव के गुण हैं। इस प्रकार आत्मा के गुणों में ज्ञान पूज्य / प्रधान है | ज्ञान धारण की शक्तिरूप वीर्य है। भेद - विवक्षा से 146 कर्म प्रकृतियाँ बंध योग्य, 148 कर्म प्रकृतियाँ उदय और सत्ता में रहती है, जबकि अभेद-विवक्षा से बंध योग्य 120, उदय योग्य 122 और सत्ता में 148 कर्म प्रकृतियाँ रहती हैं। घातिया कर्मों में 21 सर्वघाति व 26 देशघाती प्रकृतियां हैं। भेद-विवक्षा से 68 बंध योग्य पुण्य प्रकृतियाँ और अभेद - विवक्षा से 42 हैं । इसी प्रकार भेद-विवक्षा से 78 बंध योग्य पाप-प्रकृतियाँ और अभेद - विवक्षा से 82 हैं। स्पर्श, रस, गंध, वर्ण की 20 प्रकृतियाँ पुण्य-पाप दोनों रूप होती हैं। स्पष्ट है कि पापरूप कर्म प्रकृतियाँ अधिक हैं । सम्यक्त्व विराधनी 'मिथ्यात्व' अनंत-संसार का कारण होने से 'अनंत' और उससे 'अनुबंधनंति' या सम्बन्ध करने के कारण यह कषाय 'अनंतानुबंधी' कहलाती है। उसका वासनाकाल अनंतकाल है। देश - चारित्र - विराधनी अप्रत्याख्यानावरण का वासनाकाल छह माह है । सकल संयम विराधनी प्रत्याख्यानावरण का वासना काल पन्द्रह दिन है और संयम की प्रकाशक संज्वलन कषाय का वासना काल अंतर मुहूर्त्त है। अकषायरूप ज्ञानस्वरूपी आत्मा को समझकर उसमें रमनेवाला जीव मिथ्यात्व एवं क्रोधादि कषायजन्यकर्मचक्र से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है । किस कर्म प्रकृति के उदय का फल किस प्रकार होता हैं, उसको विपाक कहते हैं । इस दृष्टि से 62 कर्म प्रकृतियाँ पुद्गल - विपाकी हैं। चार भव- विपाकी, 8 क्षेत्र - विपाकी और 78 (47 घातिया कर्म, 27 नाम कर्म और 22 वेदनीय - गोत्र ) प्रकृतियाँ जीव - विपाकी हैं । जीवविपाकी कर्म प्रकृतियों में 'मोहनीय कर्म' ही कर्म-बंध का कारण है। अतः आत्मानुभूतिपूर्वक उसके नाश का प्रथम पुरुषार्थ करना चाहिए ।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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