SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 28
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ जैनविद्या - 19 __आगे नाम, स्थापना, द्रव्य एवं भाव इन चार निक्षेपों के स्वरूप, भेद-प्रभेद आदि का वर्णन कर्मों के संदर्भ में गाथा 52 से 76 तक किया है, जो पठनीय है। 2. बंधोदय सत्वाधिकार - इस अध्याय में आचार्य नेमिचंद्र ने परम शुद्ध उत्कृष्ट ज्ञान की प्राप्ति हेतु 'असहाय-पराक्रम' अर्थात् अभेदरूप रत्नत्रय द्वारा अपनी निज सामर्थ्य से ही कर्मबैरी को जीतनेवाले सिद्ध-बुद्ध तीर्थंकर नेमिनाथ को नमस्कार कर गुणस्थान एवं मार्गणा स्थानों में कर्म-बंध, कर्म-उदय एवं कर्मों की सत्ता का वर्णन गाथा क्रमांक 87 से 357 तक किया है। कर्म-बंध - कर्म-बंध चार प्रकार का है। प्रकृति-बंध, स्थिति-बंध, अनुभाग-बंध और प्रदेश-बंध। इन चार कर्मों के उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट, जघन्य, अजघन्य ये चार-चार भेद हैं। प्रकृति-बंध - इसमें किन-किन कर्म-प्रकृतियों का बंध किस-किस गुणस्थान तक होता है, यह बताया है - जैसे तीर्थंकर प्रकृति का बंध सम्यक्त्वी को चौथे से आठवें गुणस्थान के छठे भाग तक तीर्थंकर या श्रुतकेवली के पादमूल में होता है । इसके पश्चात् गुणस्थानों में 120 कर्मों की बंध-व्युच्छिति (अर्थात् बंध का रुकना या संवर), बंध व अबंध का वर्णन किया है। जैसे - सम्यक्त्व के कारण प्रथम गुणस्थान के अंत में निकृष्ट 16 कर्म प्रकृतियों का बंध रुक जाता है, दूसरे गुणस्थान में 25 नीच प्रकृतियों का बंध रुक जाता है आदि। बंध की दृष्टि से पहले गुणस्थान में 117 कर्म प्रकृतियों का बंध होता है और चौदहवें गुणस्थान में बंध नहीं होता आदि। कुछ कर्म प्रकृतियों का गुणस्थानों में बंध नहीं होता जैसे प्रथम गुणस्थानों में 3, दूसरे में 19 आदि। मार्गणा-स्थानों में भी इसी प्रकार कर्म-बंध का वर्णन गाथा 126 तक है। __ स्थिति-बंध - आत्मा के साथ कर्मों के रहने की मर्यादा या समय को स्थिति-बंध कहते हैं । इसमें मूल और उत्तर प्रकृतियों की उत्कृष्ट, जघन्य स्थिति-बंध और उनके बंधकों का वर्णन गाथा 127 से 162 तक है । जैसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अंतराय, वेदनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति 30 कोड़ा-कोड़ी सागरप्रमाण; नाम और गोत्र की 20 कोड़ा-कोड़ी सागर; मोहनीय कर्म की 60 कोड़ा-कोड़ी सागर तथा आयु कर्म की स्थिति शुद्ध 33 सागर तक की है। स्थिति-बंध का मूल कारण भाव या परिणाम है जो दो प्रकार के होते हैं - कषायसहित संक्लेश परिणाम और मंद कषाययुक्त विशुद्ध परिणाम। तिर्यंच, मनुष्य व देव आयु को छोड़कर शेष 117 प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थिति-बंध, उत्कृष्ट संक्लेश परिणामों से होता है और जघन्य स्थिति-बंध विशुद्ध परिणामों से होता है। आहाराक-द्वि तीर्थंकर और देवायु को छोड़कर शेष 116 प्रकृतियों का उत्कृष्ट स्थिति-बंध मिथ्यादृष्टि जीव ही करता है। अर्थात् उक्त चार प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति-बंध सम्यग्दृष्टि को ही होता है। आबाधा काल - कर्म के बंध और कर्म के उदय या उदीरणा के बीच के अंतर का समय आबाधा काल कहलाता है, जैसे - एक कोड़ा-कोड़ी सागर-प्रमाण का आबाधा काल 100 वर्ष प्रमाण होता है। इसी अनुपात में अन्य कर्म-बंध का आबाधा काल आयु कर्म को छोड़कर शेष सात कर्मों के उदय का होता है । उदीरणा की अपेक्षा सात कर्मों का आबाधा काल एक आवली है। समय-पूर्व कर्मों का उदय में आना या खिरना उदीरणा कहलाता है। आबाधाकाल की
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy