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जैनविद्या - 19
अंतरभाव अधिकार - इसमें गति आदि 14 मार्गणा के गुणस्थान एवं जीव-समास का वर्णन है। द्वितियोपशम सम्यक्त्व के साथ गुणस्थानों के अंतर्गत जीव समास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, मार्गणा और उपयोग का वर्णन गाथा 677 से 705 तक किया है।
आलाप अधिकार - इस अधिकार में 706 से 734 तक गाथाएँ हैं। जिनमें 'गुणजीवा पज्जती' बीस प्ररूपणा का आलाप अर्थात् गुणस्थान एवं मार्गणास्थान के भेद-सहित कथन किया है। इनके सामान्य, पर्याप्ति और अपर्याप्ति ये तीन आलाप हैं । अनिवृत्तिकरण के पाँच भाग की अपेक्षा पाँच आलाप हैं, जिनके दो भेद हैं - लब्ध्य पर्याप्त और निर्वत्य पर्याप्त । अंत में चौदह गुणस्थान, जीव समास, संज्ञा पर्याप्ति, दशप्राण एवं द्रव्यकर्म-भावकर्म रहित सदा-शुद्ध सिद्ध परमेष्ठी का वर्णन कर, घोषित किया है कि जो जीव निक्षेप, एकार्थ (योनि) नय, प्रमाण, निरुक्ति, नियोग के द्वारा जो गुणस्थानादिक बीस प्ररूपणा के भेद को जानते हैं, वे जीव भव्य हैं, वे आत्मा के सत् समीचीन भाव को जानते हैं और तदनुसार सिद्ध होते हैं - ये ही ग्रंथकार को इष्ट हैं। अंतिम गाथा 734 में आचार्य नेमिचंद्र ने अपने शिष्य गोम्मटरूप चामुंडराय राजा को 'गोम्मटो जयउ' का आशीर्वाद देकर जीवकाण्ड समाप्त किया। (ब) गोम्मटसार कर्मकाण्ड
आचार्य नेमिचंद्र ने "कर्मणां निर्जरार्थं तत्त्वार्थ व धारणार्थं च" अर्थात् कर्मों की निर्जरा एवं तत्त्वों के स्वरूप के अवधारण-निश्चय के उद्देश्य से गोम्मटसार संग्रह सूत्र (गाथा 965) की रचना की। जीवकाण्ड में जीव का वर्णन किया है। कर्मकाण्ड में संसार दुखदायक या सुख प्रतिबंधककर्म सिद्धांत का सूक्ष्म विवेचन 972 गाथाओं में किया है। कर्मकाण्ड में नौ अधिकार हैं, जिनकी संक्षिप्त विषय-वस्तु निम्न प्रकार है -
1. प्रकृति समुत्कीर्तनाधिकार - सम्यक्त्व की प्राप्ति हेतु ज्ञानावरणादिक कर्मों की मूल और उत्तर प्रकृतियों का वर्णन किया है। प्रकृति का अर्थ स्वभाव है। जिस प्रकार जल का स्वभाव नीचे की ओर गमन करना है, उसी प्रकार जीव और कर्म (कार्माण पुद्गल परमाणु) का भी स्वभाव है। जीव का स्वभाव रागादि-रूप होने का तथा कर्म का स्वभाव निमित्तरूप से रागादि उत्पन्न करा देने का है। इस स्वभाव के कारण जीव और कर्म का संबंध अनादि काल से है। संसारी जीवों में कर्म-बंध और उदय की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। जीव के आंतरिक परिणाम और योग की स्थिति के अनुसार कम या अधिक कर्म-बंध होता है। कर्मों की निर्जरा प्रति समय होती है परन्तु 1'/, गुना कर्म सत्ता में बने रहते हैं। इतना विशेष है कि सम्यक्त्वादि के कारण अनेक कर्मों की निर्जरा हो जाती है जो पुरुषार्थ की द्योतक है। कर्म के दो भेद हैं - द्रव्य कर्म और भाव कर्म । ज्ञानावरणादिक पुद्गल द्रव्य-कर्म है और उन पुद्गल द्रव्यकर्मों के फल देने की शक्ति भाव-कर्म है। इस शक्ति के निमित्त से आत्मा में जो रागादि भाव होते हैं उन्हें भी भाव-कर्म कहते हैं। ___यद्यपि कर्म-कर्मपने से अभेद हैं; किन्तु कर्मों की प्रकृति एवं उनके फल देने की क्षमता के आधार पर उनमें भेद हुआ है। मूल कर्म आठ हैं - ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय