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________________ जैनविद्या - 19 में, अनंतानुबंधी किसी एक कषाय का उदय होने पर दूसरे गुणस्थान में, मिश्र प्रकृति का उदय होने पर तीसरे गुणस्थान में और सम्यक् प्रकृति का उदय होने पर क्षायोपशमिक सम्यक्त्व हो जाता है। प्रथमोपशम और क्षायोपशमिक सम्यक्त्व चतुर्थ से सप्तम गुणस्थान तक होता है। द्वितीयोपशम सम्यक्त्व सप्तम से ग्यारहवें गुणस्थान तक होता है। क्षायिक सम्यक्त्व चतुर्थ गुणस्थान से सिद्ध अवस्था तक रहता है। सम्यक्त्व के पहले पाँच लब्धियाँ होती हैं - क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशना लब्धि, प्रायोग्य लब्धि, तथा अध:करण, अपूर्वकरण एवं अनिवृत्ति करण रूप परिणमित होने योग्य करणलब्धि । करण का अर्थ परिणाम है। इनमें प्रथम चार लब्धियाँ भव्य और अभव्य दोनों को होती हैं। किन्तु करणलब्धि सम्यक्त्व ग्रहण करने की योग्यता होनेवाले भव्य जीव को ही होती है। इस दृष्टि से सम्यक्त्व में करणलब्धि नियामक एवं पुरुषार्थपरक है। गाथा 561 से 659 तक छह द्रव्यों, नौ पदार्थों, सम्यक्त्व के भेद-प्रभेद, गुणस्थानों के जीवों की संख्या, सम्यक्त्व ग्रहण योग्य जीव और सम्यक्त्वमार्गणा के जीवों की संख्या आदि का विस्तृत विवेचन किया है। (13) संज्ञी मार्गणा - जीव दो प्रकार के हैं - 1. संज्ञी और 2. असंज्ञी। जो मनसहित हैं, हित-अहित की शिक्षा ग्रहण करने योग्य हैं, कार्य-अकार्य एवं तत्त्व-अतत्त्व, का विचार करनेवाले हैं वे संज्ञी जीव कहलाते हैं। इसके विपरीत मन-रहित, मात्र इंद्रिय-ज्ञानवाले जीव असंज्ञी कहलाते हैं। गाथा 660 से 663 तक इन जीवों का स्वरूप एवं इनकी संख्या का वर्णन है। संज्ञी जीव मिथ्यादृष्टि से क्षीणकषाय गुणस्थान-पर्यंत होते हैं । असंज्ञी जीव स्थावर नाम से लेकर असैनी पंचेद्रिय पर्यंत मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में ही होते हैं । (14) आहार मार्गणा - औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीरों में से किसी एक के उदय को प्राप्त शरीर के योग्य शरीरवर्गणा, भाषावर्गणा और मनोवर्गणा योग्य नो-कर्म वर्गणाओं के ग्रहण करने का नाम आहार है । आहारक मार्गणा के दो भेद हैं - अनाहारक और आहारक। तीन शरीरों और छः पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलरूप जिनके आहार नहीं होता वह अनाहारक होता है। विग्रहगति को प्राप्त हुए चारों गति के जीव, प्रतर और लोक समुद्घात को प्राप्त सयोग केवली और अयोग केवली तथा सिद्ध भगवान - ये सब अनाहारक हैं। शेष सब आहारक हैं। गाथा 664 से 671 तक आहारक-अनाहारक का स्वरूप, भेद, समुद्घात का स्वरूप और भेद तथा जीवों की संख्या आदि का वर्णन है। उपयोग प्ररूपणा - जीव का जो भाव वस्तु को ग्रहण करने के लिए प्रवृत्त होता है उसे उपयोग कहते हैं । चेतना की ज्ञान-दर्शनरूप परिणति उपयोग कहलाती है। यह दो प्रकार की है - साकार और अनाकार । मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय एवं केवलज्ञान - ये पाँच ज्ञान और कुमति, कुश्रुत एवं कुअवधि ये तीन अज्ञान इस प्रकार आठ साकार उपयोग हैं। चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवल ये चार दर्शन निराकार उपयोग हैं । गाथा 672 से 676 तक अयोग का स्वरूप, भेद-प्रभेद, काल एवं उनके जीवों की संख्या का वर्णन किया है।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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