________________
जैनविद्या - 19
15 अनंतानुबंधी और अप्रत्याख्यान कषायों की छः लेश्या होने से 24-24 लेश्या होती हैं। प्रत्याख्यान और संज्वलन कषाय को पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या होने के कारण 12-12 भेद होते हैं । दुखस्वरूप कृष्ण, नील, कापोत लेश्या के भाव असंयतगुणस्थान तक होते हैं । पाँचवें गुणस्थान से 10 वें गुणस्थान तक क्रमशः यथायोग्य तीन शुभ लेश्याएँ होती हैं । छहों द्रव्य लेश्याएँ तो सयोग-अयोग केवली गुणस्थान तक होती हैं । शुक्ल लेश्या के जीव सर्वार्थसिद्धि सहित पंच अनुत्तर विमान तक उत्पन्न होते हैं । सिद्ध भगवान कृष्णादि लेश्यारहित-अलेश्य हैं क्योंकि उनके मोह आदि द्रव्य कर्म, भाव कर्म और नो कर्मों का अभाव होता है। वे सिद्धपुरी में अनंत अव्याबाध, अतीन्द्रिय सुख का वेदन करते हैं।
(11) भव्य मार्गणा - सिद्ध अर्थात् अनंत चतुष्टयरूप स्वरूप धारण करने योग्य होनहार जीव भव्य कहलाते हैं। जिनमें सिद्धि की योग्यता नहीं होती और जो मुक्त नहीं होंगे वे अभव्य जीव हैं। भव्य मार्गणा के तीन भेद हैं - भव्य, दूरान्दूर भव्य और अभव्य । जीवत्व पारिणामिक भाव धारण करनेवाले मुक्त जीव न भव्य हैं और न अभव्य । गाथा 557 से 560 तक भव्य-अभव्य के स्वरूप भेद, भव्य-अभव्य जीवों की संख्या का वर्णन किया है। __(12) सम्यक्त्व मार्गणा - सर्वज्ञदेव द्वारा कथित जीवादिक छहों द्रव्य, पाँच अस्तिकाय और नौ पदार्थ का श्रद्धान, रुचि और यथावत प्रतीति ही सम्यक्तव है। 'तत्वार्थ श्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' एवं 'तत्त्वरुचि सम्यक्त्व' का एक ही भाव है। सर्वज्ञ-कथित, आप्त, आगम और पदार्थों का श्रद्धान करना सम्यक्त्व है । यह दो प्रकार का है - 1. सराग सम्यक्त्व और 2. वीतराग सम्यक्त्व। प्रशम, संवेग, अस्तिक्य आदि गुणसहित श्रद्धान सराग सम्यक्त्व है और केवल शुद्ध चैतन्य आत्म-तत्व-का श्रद्धानरूप विशुद्धता वीतराग सम्यक्त्व है। आत्मा में सम्यक्त्व की उत्पत्ति निर्विकल्प आत्मानुभूतिपूर्वक होती है। उस काल में दर्शन मोहनीय कर्म का उपशम, क्षयोपशम या क्षय होता है। सम्यक्त्व प्राप्ति के समय चारित्र मोहनीय कर्म की अनंतानुबंधी चार कषायों का उपशम या विसंयोजन होता है, ऐसा नियम है। सम्यक्त्व में शुद्धात्मा का श्रद्धान, रुचि एवं अंतरंग में तदनुसार अभिप्रायः महत्वपूर्ण है। सम्यक्त्व के बिना आगम ज्ञान, चारित्र, व्रत, तप आदि कार्यकारी नहीं हैं। चारों गतियों के पंचेद्रिय संज्ञी, पर्याप्त, विशुद्ध परिणामों युक्त शुभ . लेश्याधारी भव्य जीवों को निसर्ग अर्थात् स्व-परिणाम और अधिगम अर्थात् उपदेश के निमित्त से सम्यक्त्व होता है।
सम्यक्त्व मार्गणा के छह भेद हैं - मिथ्यात्व, मोहनीय, सम्यक् मिथ्यात्व मोहनीय, सम्यक् मोहनीय, औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व एवं क्षायिक सम्यक्त्व । इनमें प्रथम दो प्रकृतियाँ सर्वघाती हैं और सम्यक् मोहनीय देशघाती है। सम्यग्मिथ्यात्व मोहनीय एवं सम्यक् मोहनीय का बंध नहीं होता, ये सत्व और उदय रूप प्रकृतियाँ हैं । कर्म भूमि में उत्पन्न मनुष्य को क्षायिक सम्यक्त्व केवली भगवान के पाद मूल में होता है । क्षायिक और औपशमिक सम्यक्त्व की निर्मलता समान है; किन्तु क्षायिक निश्चल भी होता है। क्षायोपशमिक सम्यक्त्व चल, मल, अगाढ़ लक्षणसहित समल होता है । अनादि मिथ्यादृष्टि जीव को सर्वप्रथम प्रथमोपशम सम्यक्त्व होता है। इसका अंतरमुहूर्त्तकाल होने के बाद मिथ्यात्व प्रकृति का उदय होने पर पहले गुणस्थान