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________________ 0 जैनविद्या - 19 (अ) गोम्मटसार जीवकाण्ड , जीवकांड में 734 गाथायें हैं । नेमिचन्द्र आचार्य ने जीवकांड की पहली गाथा में 'जीवस्सपरुवणं वोच्छं' कहकर जीव-प्ररूपणा करने की प्रतिज्ञा की। इस ग्रन्थ में चेतना एवं चार प्राणों अर्थात् बल, इंद्रिय, आयु और श्वासोच्छ्वास से जीनेवाले जीव की गहन खोज की है। स्वभाव से ज्ञान-दर्शन-उपयोगमयी सिद्ध समान यह जीव अनादि काल से 'मोह-जोग भवा' (जीव काण्ड गाथा 3) अर्थात् मोह (दर्शन मोह और चारित्र मोह) तथा योग (मन, वचन और काय) के कारण संसार में दुःख भोग रहा है और 84 लाख योनियों में भटक रहा है। आत्म-सिद्धि हेतु ऐसे संसारी जीवों की खोज बीस प्ररूपणाओं अर्थात् बीस माध्यमों से की गई है। वे हैं - गुणस्थान, जीव-समास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, उपयोग और चौदह मार्गणाएँ । गति, इंद्रिय, काय, योग, वेद, कषाय, ज्ञान, संयम, दर्शन, लेश्या, भव्य, सम्यक्त्व, संज्ञी और आहार ये चौदह मार्गणाएँ हैं । इस प्रकार इन बीस माध्यमों से जीव की विविध दशाओं, भावों एवं संसार में उसकी स्थिति का व्यापक व्यवस्थित एवं सूक्ष्म वर्णन किया है, जो मूलतः पठनीय-मननीय है। सिद्ध भगवान गुणस्थान, मार्गणास्थान आदि से रहित हैं। जीवकाण्ड में 22 अधिकार हैं । प्रथम पाँच क्रमशः (1) गुणस्थान, (2) जीवसमास, (3) पर्याप्ति, (4) प्राण और (5) संज्ञा से सम्बन्धित हैं। छठे अधिकार से उन्नीसवां अधिकार उक्त चौदह मार्गणाओं से संबंधित है । बीसवां अधिकार उपयोग का है । इक्कीसवां अन्तरभावाधिकार है और बाइसवां आलाप-अधिकार है। गुणस्थान प्ररूपणा मोह-योग के निमित्त से जीव के श्रद्धा और चारित्रगुण की तारतम्यरूप अवस्था का नाम गुणस्थान है । गुणस्थान चौदह हैं - (1) मिथ्यादृष्टि, (2) सासादन सम्यग्दृष्टि, (3) मिश्रभाव, (4) अविरति सम्यग्दृष्टि, (5) देशविरत, (6) प्रमत्त संयत, (7) अप्रमत्त संयत, (8) अपूर्वकरण, (9) अनिवृत्तिकरण, (10) सूक्ष्म सांपराय, (11) उपशांत मोह, (12) क्षीणमोह, (13) सयोगकेवलीजिन और (14) अयोगकेवलीजिन। इनमें प्रथम चार गुणस्थान दर्शन मोह के उदय, उपशम, क्षयोपशम या क्षय से सम्बन्धित हैं । पाँचवें से तेरहवें गुणस्थान तक चारित्रमोह के उपशम, क्षयोपशम एवं क्षय से सम्बन्धित हैं । 14वाँ गुणस्थान योग के अभाव से सम्बन्धित है। प्रथम गुणस्थान अधिकार की 69 गाथाओं में इनका सूक्ष्म वर्णन है। शुद्धोपयोग द्वारा मोह के उपशम, क्षयोपशम या क्षय से क्रमशः कर्मों का क्षय होकर वीतरागता प्रगट होती जाती है और अंततः सिद्धत्व की प्राप्ति होती है। जीव-समास प्ररूपणा ____ संसार के नाना जीव और उनकी नाना प्रकार की जातियाँ जिन 'धर्म-विशेषों के द्वारा जानी जाती हैं वे जीव-समास कहलाते हैं। त्रस-स्थावर, बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त और प्रत्येकसाधारण ये चार जीव-समास हैं। एकेन्द्रिय के बादर-सूक्ष्म, दो-तीन एवं चार इंद्रिय के जीव, पंचेन्द्रिय के संज्ञी-असंज्ञी इस प्रकार सात भेद हुए। इनके पर्याप्त-अपर्याप्त रूप चौदह भेद होते हैं। इसी प्रकार 19, 56 एवं 407 प्रकार का जीव-समास होता है। जीव-समास में जीव का
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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