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जैनविद्या
उत्पत्ति-स्थान योनि, शरीर का आकार-प्रकार, कुल आदि का वर्णन है । सर्व जीवों की चौरासी लाख योनि एवं एक सौ साढ़े निण्याणवे लाख करोड़ कुल होते हैं। जिनका जीव- समास में 70 से 117 गाथाओं में विशद वर्णन है ।
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पर्याप्ति प्ररूपणा
नाम, कर्म के उदय से जीव को प्रत्येक योनि में शरीर, श्वासोच्छ्वास, इंद्रिय, आहार, भाषा और मन इनका निर्माण जीव की पर्याय में योग्यतानुसार होता है। जब इनका निर्माण पूर्ण हो जाता है, तब जीव पर्याप्त कहलाता है और अपूर्णता को अपर्याप्त कहते हैं। जीव की भिन्न-भिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न पर्याप्ति-अपर्याप्ति का वर्णन गाथा 118 से 128 तक किया गया है। तथा किस पर्याप्ति-अपर्याप्ति में कौनसा गुणस्थान होगा यह भी बताया है ।
प्राण प्ररूपणा
ज्ञानावरण और वीर्यान्तराय के क्षयोपशम से उत्पन्न जीव का चैतन्य उपयोग भावप्राण है जबकि पाँच इंद्रिय, मन, वचन, काय, आयु व श्वासोच्छ्वास- ये दस व्यवहार प्राण हैं, जो मतिज्ञानावरण एवं वीर्यान्तराय के क्षयोपशम और नाम कर्म एवं आयु कर्म के उदय प्राप्त होते हैं। गाथा 129 से 133 तक किस जाति के जीव के कितने प्राण होंगे इसका विवेचन है । संज्ञा प्ररूपणा
वांछा या तृष्णा ही संज्ञा है जो सभी संसारी जीवों में पायी जाती है। आहार, भय, मैथुन और परिग्रह- ये चार संज्ञाएँ होती हैं। संज्ञा का कारण और स्वामित्व आदि का वर्णन गाथा संख्या 134 से 139 में है। संज्ञा तत् सम्बन्धित कर्म की उदय उदीरणा से उत्पन्न होती है । आगे मोहरूपी बैरी की हत्या करने हेतु चौदह मार्गणा और उसके भेद आदि का वर्णन प्रारम्भ में किया है।
मार्गणा
(1) गति मार्गणा - गमन करना ही गति है। नामकर्म के उदय से जीव का चार गतियों अर्थात् देव, मनुष्य, तिर्यंच नरक गति में गमन करते रहना ही गति है । गाथा 140 से 163 तक चार गतियों के जीवों की संख्या आदि का वर्णन किया गया है।
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(2) इंद्रिय मार्गणा - इंद्र अर्थात् आत्मा को जानने का जो चिह्न है वह इंद्रिय है । इंद्रियाँ अपने-अपने विषय - सेवन में स्वतंत्र हैं । इंद्रियाँ पाँच होती हैं। गाथा 164 से 180 तक इंद्रियों के भेद, प्रभेद, स्वामी, क्षेत्र, संख्या, अवगाहना आदि का वर्णन विस्तार से किया गया है।
(3) काय मार्गणा - काय का सामान्य अर्थ शरीर है। नामकर्म के उदय से त्रस - स्थावर जीवों को जो पर्याय प्राप्त होती है वह काय है। काय के छः प्रकार हैं- पृथ्वी काय, अप काय, तेज काय, वायु काय, वनस्पति काय और त्रस काय । गाथा 181 से 215 तक छ: काय के जीवों भेद-प्रभेद, प्रतिष्ठित - अप्रतिष्ठित, बादर - सूक्ष्म, पर्याप्त अपर्याप्त जीवों की संख्या, त्रसों का वास स्थान, शरीर का आकार आदि का विस्तृत वर्णन है ।
(4) योग मार्गणा - 'युज्यते इति योग : ' जो सम्बन्ध अर्थात् संयोग को प्राप्त हो उसे योग कहते हैं। नामकर्म के उदय से प्राप्त मन-वचन-काय की प्रवृत्ति से आत्मा के प्रदेश चंचल या