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________________ जैनविद्या - 19 से पुकारी जाती थी। इसके अलावा विंध्यगिरि के सामने चंद्रगिरि पर चामुण्डराय वसति के नाम से एक सुन्दर जैन मंदिर बनवाया। इसमें एक हाथ ऊँची इंद्रनीलमणि की श्री नेमिनाथ भगवान की मूर्ति स्थापित की थी (गाथा 968)। नेमिचन्द्राचार्य ने गोम्मटसार की गाथा 966 से 969 एवं 971 से 972 में चामुण्डराय उपनाम गोम्मट राजा का गुणगान किया है, जो पठनीय है । गोम्मटसार की अंतिम गाथा 972 के अनुसार वीर गोम्मट राजा ने गोम्मटसार ग्रन्थ के सूत्र की देशी भाषा में टीका की। उन्होंने वि.सं. 1035 में चामुण्डराय पुराण भी लिखा। इस प्रकार चामुण्डराय न केवल वीर सेनापति-महामात्य थे अपितु वे अध्यात्मप्रिय टीकाकार/साहित्यकार एवं समर्पित जैन श्रावक भी थे। उनका जीवन-दर्शन, जैन-धर्मावलम्बियों के लिए प्रेरणा-स्रोत है जो सेनापति होकर भी साहित्यकार थे और अहिंसा धर्म का पालन करते थे। कृतियाँ एवं गुरु नेमिचन्द्राचार्य ने करणानुयोग के गोम्मटसार, लब्धिसार एवं त्रिलोकसार सिद्धांत ग्रन्थों की रचना की। गोम्मटसार दो भागों में विभक्त है, वे जीवकाण्ड - कर्मकाण्ड के नाम से प्रसिद्ध हैं । लब्धिसार भी लब्धिसार - क्षपणासार के नाम से जाना जाता है। उनके इस योगदान के कारण उन्हें 'सिद्धांतचक्रवर्ती' की उपाधि से विभूषित किया गया। __ नेमिचंद्राचार्य ने आचार्य अभयनंदि, वीरनंदि एवं इंद्रनंदि को अपना गुरु बताया है। कर्मकाण्ड गाथा 436 में उन्होंने अपने को शास्त्रशिक्षा-दायक आचार्य वीरनंदी का वत्स शिष्य एवं आचार्य अभयनंदि को श्रुत गुरु के रूप में नमस्कार किया है। इसी प्रकार गाथा 785 में अभयनंदि मुनीश्वर बहुशास्त्र के पारगामी इंद्रनंदि गुरु एवं उत्कृष्ट वीरनंदि स्वामी गुरुओं को नमस्कार किया है। लब्धिसार की अंतिम दो गाथाओं अर्थात् 652 एवं 653 में भी उक्त तीनों आचार्य गुरुओं को श्रद्धावनत् नमस्कार किया है जिन्होंने अपने शिष्य नेमिचंद्र को ज्ञान-दान द्वारा पोषित किया है और इनके चरणों के प्रसाद से वे अनंत संसार से पार हुए। इनमें आचार्य अभयनंदि सिद्धांतशास्त्रों के ज्ञाता थे, वे आचार्य नेमिचंद्र के शिक्षा-दीक्षा गुरु थे जबकि वीरनंदि एवं इन्द्रनंदि का उनले वरिष्ठ शिक्षा गुरु होना प्रतीत होता है। ये दोनों आचार्य जैन कर्म-सिद्धांत के पारगामी विद्वान थे। 1. गोम्मटसार _ 'गोम्मटसार' सिद्धांतचक्रवर्ती आचार्य नेमिचंद्र की महत्वपूर्ण कृति है । इस ग्रन्थ की रचना का उद्देश्य तीर्थंकर वीर-वर्धमान के उपदेश के अनुसार ज्ञानावरणादिक कर्मों की निर्जरा एवं तत्त्वों के स्वरूप का निश्चय धारण करना है (गाथा 965) । इस ग्रन्थ का रचना-काल विक्रम संवत् 1040 होना प्रतीत होता है। आचार्य अमितगति ने अपने पंचसंग्रह (वि.सं. 1073) में गोम्मटसार ग्रन्थ की विषय-सामग्री का उपयोग किया है। जैसे - प्रथम अध्याय में 363 मतों की उत्पत्ति एवं कर्मकाण्ड में काल, ईश्वर, आत्मा, नियति और स्वभाव का लक्षण आदि गोम्मटसार के अनुवाद मात्र प्रतीत होते हैं।
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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