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जैनविद्या - 19
एवं भूतबली ने 'षट्खण्डागम' की रचना की । यतिवृषभ आचार्य ने 'कषाय पाहुड' पर चूर्णि सूत्र लिखे। ये रचनाएँ केवली -कथित करणानुयोग के कर्म सिद्धांत के गूढ़ रहस्यों से सम्बन्धित हैं। इन दोनों ग्रन्थों की विशद टीका/व्याख्या 9वीं शताब्दी में आचार्य वीरसेन द्वारा की गई, जो क्रमश: जयधवला और धवला के नाम से प्रसिद्ध हुईं। ये टीका- ग्रन्थ अपने आप में स्वतंत्र एवं परिपूर्ण ग्रन्थ जैसे हैं । जैन धर्मावलम्बियों द्वारा करणानुयोग के इन ग्रन्थों का पठन-पाठन निर्बाध चलता रहा। चूंकि करणानुयोग के उक्त ग्रन्थ अत्यन्त सूक्ष्म एवं जटिल हैं, अत: परवर्ती आचार्यों द्वारा यह प्रयास किया जाता रहा कि उसके रहस्य को जनसामान्य के समझने योग्य भाषा में व्यक्त किया जाये ।
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इस उद्देश्य की पूर्ति ग्यारहवीं शताब्दी के आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती द्वारा की गई। उन्होंने षट्खण्डागम एवं उसकी धवला टीका तथा कषायपाहुड एवं उसकी जयधवला टीका का गहन एवं सूक्ष्म अध्ययन कर उनके आधार पर 'गोम्मटसार' (द्वितीय नाम पंचसंग्रह) तथा 'लब्धिसार' ग्रन्थों की रचना की। इनके अलावा उन्होंने 'त्रिलोकसार' की भी रचना की। इन रचनाओं में नेमिचन्द्राचार्य ने गागर में सागर भरने की कहावत चरितार्थ की है। गोम्मटसार कर्मकाण्ड की गाथा (397 में) उन्होंने घोषणा की कि जिस प्रकार चक्रवर्ती चक्ररत्न से छः खण्डों को निर्विघ्न साधता/ जीतता है, उसी प्रकार मैंने ( नेमिचन्द्र ने) बुद्धि-रूपी चक्र से जीवस्थान, क्षुद्रकबंध, बंधस्वामी, वेदनां खण्ड, वर्गणा खण्ड एवं महाबंध - इन छ: खण्डों के सिद्धांत को सम्यक् रूप से साध लिया है।
जह चक्केणयचक्की, छक्खण्डं साहियं अविग्घेण ।
तह मइचक्केण मया, छक्खण्डं साहियं सम्मं ॥397 ॥
जीवन परिचय
नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती का समय 989 ईस्वी के लगभग है । वे प्रतिभासम्पन्न, मेधावी, अध्यात्मरसिक एवं (जैनदर्शन में ) कर्म - सिद्धांत के पारगामी आचार्य थे। वे गंगवंशी राजा राचमल्ल के मंत्री एवं सेनापति चामुण्डाराय के गुरु थे । चामुण्डराय के घर का उपनाम 'गोम्मट' था। इसी से श्रवणबेलगोल में उनके द्वारा स्थापित भगवान बाहुबली की मूर्ति 'गोम्मटेश्वर ' (गोम्मट अर्थात् चामुण्डराय के ईश्वर) के नाम से प्रसिद्ध हुई । नेमिचन्द्र आचार्य ने अपनी कृति का नाम भी 'गोम्मटसार' रखा, जो उनकी जिज्ञासाओं की पूर्ति हेतु बनाई थी ।
चामुण्डराय अत्यन्त पराक्रमी और वीर थे। उन्होंने अनेक युद्ध जीते थे। इस कारण उन्हें अनेक उपाधियाँ मिली थीं। वे जैनदर्शन के मर्मज्ञ, ज्ञाता एवं धर्मप्रेमी थे । गोम्मटसार ग्रन्थ में आचार्य नेमिचन्द्र ने उन्हें 'सम्यकत्व रत्न निलय', 'गुणरत्न भूषण', 'सत्य युधिष्ठिर' एवं 'देवराज' जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया है । चामुण्डराय ने मैसूर के श्रवणबेलगोल की विंध्यगिरि तराश करवाकर ई. सन् 981 (विक्रम संवत् 1038 ) में भगवान बाहुबली की 57 फीट ऊँची मूर्ति स्थापित की। यह मूर्ति 'दक्षिण कुक्कुटजिन' के नाम से प्रसिद्ध हुई । उत्तर भारत में भरत चक्रवर्ती ने भगवान बाहुबली की मूर्ति स्थापित की थी जो 'उत्तरकुक्कुट जिन' के नाम