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________________ जैनविद्या 19 अप्रेल 1997-1998 7 कर्म - सिद्धांत के ज्ञाता नेमिचन्द्राचार्य व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व - - डॉ. राजेन्द्रकुमार बंसल जैनदर्शन बहुआयामी दर्शन हैं, जिसमें जीव- पुद्गल आदि छः द्रव्य, ब्रह्मांड, विश्वव्यवस्था, दु:ख-सुख एवं बंध - मोक्ष का स्वरूप और उससे मुक्त होने का उपाय आदि के सम्बन्ध में कारण-कार्यसहित तर्क-आधारित व्यवस्था की गई है। अनादि - अनन्त विश्व के द्रव्यों का स्वभाव या धर्म निरूपित करनेवाला जैनधर्म भी अनादि - अनन्त है। इसका प्रतिपादन तीर्थंकरों द्वारा अपने समय की आवश्यकता के संदर्भ में किया जाता रहा है। इस युग के अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर थे। भगवान महावीरं के उपदेश को परवर्ती आचार्यों ने चार अनुयोगों / भागों में विभक्त किया - 1. चरणानुयोग, 2. द्रव्यानुयोग, 3. करणानुयोग एवं 4. प्रथमानुयोग । इसमें चरणानुयोग का सम्बन्ध आचरण से है, द्रव्यानुयोग का सम्बन्ध तत्त्वज्ञान एवं अनुभूति से है । करणानुयोग गणितात्मक कर्म - सिद्धांत एवं विश्वदर्शन से सम्बन्धित है तथा प्रथमानुयोग में तीर्थंकरों एवं अन्य शलाका ( महापुरुषों) का जीवनचरित्र है । इनमें करणानुयोग का विषय अत्यन्त सूक्ष्म, व्यापक एवं दुरुह है । जैन दर्शन के मूल सिद्धांत के रूप में 'कषाय पाहुड' नामक प्रथम ग्रन्थ की रचना ईसा की प्रथम शताब्दी में आचार्य गुणधर ने की थी । इसके पश्चात् इसी शताब्दी में आचार्य द्वय पुष्पदन्त
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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