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________________ जैनविद्या - 19 के नाम से प्रसिद्ध हुई । नेमिचन्द्राचार्य ने अपने 'गोम्मटसार' नामक ग्रन्थ की रचना इसी 'गोम्मट' उपनामधारी चामुण्डराय के लिए की थी। इसप्रकार गंगनरेश राचमल्ल के प्रधान सचिव और सेनापति चामुण्डराय का आचार्य नेमिचन्द्र के साथ अभिन्न सम्बन्ध रहा है। आचार्य नेमिचन्द्र आगमशास्त्र के अभिज्ञाता थे। गोम्मटसार, त्रिलोकसार, लब्धिसार और क्षपणासार आचार्यश्री की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। गोम्मटसार षट्खण्डागम की धवलाटीका का मंथन करके आचार्य नेमिचन्द्र ने 'गोम्मटसार' ग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है - जीवकाण्ड और कर्मकाण्ड। 'जीवकाण्ड' में सात सौ चौंतीस गाथाएँ हैं और कर्मकाण्ड' में नौ सौ बासठ गाथाएँ हैं । इस ग्रन्थ पर दो संस्कृत टीकाएँ - नेमिचन्द्र कृत 'जीव प्रदीपिका' और अभयचन्द्र कृत 'मन्दप्रबोधिनी' भी लिखी गई हैं । गोम्मटसार की केशववर्णी द्वारा एक कन्नड़वृत्ति भी उपलब्ध है । टोडरमलजी ने 'सम्यग्ज्ञान चन्द्रिका' नाम की वचनिका लिखी है। टीकाकारों ने गोम्मटसार का एक नाम और भी दिया है 'पंचसंग्रह'।" अमितगति के पंचसंग्रह को देखकर और इसमें उसके अनुरूप कथन देखकर इस संज्ञा से अभिहित किया गया है। आचार्य नेमिचन्द्र ने तो ग्रन्थ के दूसरे भाग के अन्त में उसका नाम 'गोम्मट' संग्रह सूत्र' अथवा 'गोम्मटसूत्र' दिया है। गोम्मटसार नाम भी टीकाओं में प्राप्त है। ____ आचार्य नेमिचन्द्र ने 'गोम्मटसार' के प्रथम भाग की गाथा में 'जीवस्स परुवणंवोच्छं' लिखकर जीव की प्ररूपणा करने की प्रतिज्ञा की है और दूसरे भाग की पहली गाथा में कर्मप्रकृतियों का कथन करने की प्रतिज्ञा की है । अत: जीव और कर्मविषयक कथनों के कारण प्रथम भाग को जीवकाण्ड और दूसरे भाग को कर्मकाण्ड की संज्ञा दे दी गई किन्तु आचार्यश्री ने इस ग्रन्थ को दो भागों में ही विनिर्मित किया है क्योंकि प्रथम भाग के अन्त में उस गोम्मट राजा की जयकामना की गई है जिसके लिए 'गोम्मटसार' रचा गया था तथा दूसरे भाग के अन्त में चूँकि वह गोम्मटसार ग्रन्थ का अन्तिम भाग है इसलिए विशेषरूप से गोम्मट का गुणगान किया गया है। 'गोम्मटसार' के 'जीवकाण्ड' की दूसरी गाथा में उन बीस प्ररूपणाओं को गिनाया है जिनके द्वारा जीव का कथन किया गया है। गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति, प्राण, संज्ञा, चौदह मार्गणाएँ और उपयोग विषयक बीस प्ररूपणाएँ हैं। जीवसमास का कथन अडतालीस गाथाओं में है। उसमें स्थान, योनि, शरीर की अवगाहना और कुलों के द्वारा जीव समास का कथन विस्तार से किया है। पर्याप्ति का कथन ग्यारह गाथाओं में, प्राणों का कथन पाँच गाथाओं में, संज्ञाओं का कथन पाँच गाथाओं में है, केवल स्वामियों का कथन 'जीवकाण्ड' में विशेष है। 'जीवकाण्ड' के मार्गणाओं के कथन में एक बड़ी विशेषता यह है कि उसमें मार्गणाओं में जीवों की संख्या का कथन भी किया गया है। प्रत्येक इन्द्रिय के विषय का तथा इन्द्रियों में लगे हुए आत्मप्रदेशों का कथन विस्तार से किया है। कायमार्गणा के कथन में कई बातें विशिष्ट हैं, जैसे - त्रसों का वासस्थान, निगोदिया जीवों से अप्रतिष्ठित शरीर और स्थावर जीवों के शरीर का आकार। योगमार्गणा में इसी प्रकार कई विशिष्ट कथन हैं। कषायमार्गणा के कथन में 'जीवकाण्ड' में शक्ति, लेश्या और आयुबन्धाबन्ध की अपेक्षा कषाय के भेदों का कथन किया
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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