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________________ जैनविद्या - 19 है । एक स्थल पर लिखते हैं कि जिसके चरणों के प्रसाद से वीरनन्दि और इन्द्रनन्दि का वत्स्य अनन्त संसाररूपी समुद्र से पार हो गया उन अभयनन्दि गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ - 2 जस्स य पाय पसाए णणंत संसार जलहिमुत्तिणो । वीरिंदणं दिवच्छो णमामि तं अभयणंदि गुरुं ॥ अन्य स्थल पर आचार्यश्री लिखते हैं कि अभयनन्दि को श्रुत-समुद्र के पारगामी इन्द्रनन्दि गुरु को और वीरनन्दिनाथ को नमस्कार करके प्रकृतियों के प्रत्यय-कारण को कहूँगा - मऊण अभयदि सुद पारगिंदणंदि गुरुं । वर वीर मंदिणाहं पयडीणं पच्चयं वोच्छं ॥ 'लब्धिसार' में आचार्यश्री ने लिखा है कि वीरनन्दि और इन्द्रनंदि के वत्स्य और अभयनन्दि के शिष्य अल्पज्ञानी नेमिचन्द्र ने दर्शनलब्धि और चारित्रलब्धि का कथन किया - वीरिं दणं दिवच्छेणप्पसुदेणभयणं दिसिस्सेण । दंसण चरित्रलद्धी सु सूयिमा णेमिचंदेण ॥ ' किन्तु 'त्रिलोकसार' में उन्होंने अपने को अभयनन्दि का वत्स्य मात्र लिखा है। शेष दोनों आचार्यों का कोई उल्लेख नहीं किया - - इदि मिचंदमुणिणाणप्प सुदेणभयणंदिवच्छेण । रइओ तिलोयसारो खमंतु तं बहु सुदाइरिया ॥ - उक्त ग्रन्थों की प्रशस्तियों से स्पष्ट है कि अभयनंदि, वीरनंदि और इन्द्रनन्दि आचार्य मचन्द्र के गुरु थे । इन तीनों में से वीरनंदि तो 'चन्द्रप्रभचरित' के रचयिता ज्ञात होते हैं क्योंकि उन्होंने 'चन्द्रप्रभचरित' की प्रशस्ति में अपने को अभयनन्दि का शिष्य बतलाया है। "मुनिजननुतपादः प्रास्तमिथ्याप्रवादः सकलगुण समृद्धस्तस्य शिष्यः प्रसिद्धः । अभवदभयनन्दी जैनधर्माभिनन्दी स्वमहिमजित सिन्धु भव्य लौकेकबन्धुः । भव्याम्भोज विबोधनोद्यतमते र्भास्वत्समानत्विषः शिष्यस्तस्य गुणाकरस्य सुधियः श्री वीरनन्दीत्यभूत ।" अभयनंदि ही नेमिचन्द्र गुरु होने चाहिए क्योंकि कालगणना से उनका वही समय आता है। इसप्रकार अभयनंदि इन सबमें ज्येष्ठ तथा गुरु होने चाहिए और वीरनन्दि, इन्द्रनन्दि और नेमिचन्द्र उनके शिष्य । नेमिचन्द्र सम्भवतया सबसे छोटे थे और उन्होंने अभयनंदि गुरु से अध्ययन करने से पूर्व वीरनन्दि और इन्द्रनन्दि से भी अध्ययन किया था । वस्तुत: आचार्य नेमिचन्द्र के गुरु अभयनंदि थे और वीरनंदि व इन्द्रनंदि उनके गुरुभाई थे । आचार्य नेमिचन्द्र का शिष्यत्व चामुण्डराय ने ग्रहण किया था। चामुण्डराय गंगवंशी राजा राचमल्ल का प्रधानमंत्री और सेनापति था । उसने अनेक समरों में विजयश्री हासिल की थी अस्तु वह 'वीरमार्तण्ड' कहलाया। 'गोम्मटसार' में सम्मत्तरयणनिलय - सम्यक्त्व रत्ननिलय, गुणरयण भूषणं-गुणरत्नभूषण, सत्ययुधिष्ठिर, देवराज " आदि विशेषणों का प्रयोग हुआ है। चामुण्डराय का घरू नाम गोम्मट था । इसीलिए चामुण्डराय के द्वारा स्थापित बाहुबलि की मूर्ति गोमटेश्वर
SR No.524766
Book TitleJain Vidya 19
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKamalchand Sogani & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1997
Total Pages78
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size6 MB
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