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जैनविद्या 19
गया है । जीवकाण्ड में ज्ञानमार्गणा का कथन तो बेजोड़ है। श्रुतज्ञान के बीस भेद जो उसमें बतलाए हैं उनका कथन षट्खण्डागम के वेदनाखण्ड और उसकी धवला टीका से लिया गया है। यह कथन श्वेताम्बर साहित्य में सुलभ नहीं है। अवधिज्ञान के भेदों का कथन भी बहुत विस्तृत है। इस काण्ड में लेश्याओं का कथन बहुत विस्तार से किया है। सम्यक्त्व मार्गणा में सम्यक्त्व के भेदों का तथा उनके सम्बन्ध से छह द्रव्यों और नौ पदार्थों का कथन विस्तार लिये हुए है। इसमें तत्त्वार्थ सूत्र के पाँचवें अध्याय के सभी आवश्यक कथन संगृहीत हैं। इसतरह 'जीवकाण्ड' में गागर में सागर भर दिया है। यह काण्ड व्यवस्थित, संतुलित और परिपूर्ण होने के कारण दिगम्बर साहित्य में विशिष्ट स्थान रखता है।
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'गोम्मटसार' के 'कर्मकाण्ड' के दो संस्करण - एक तो रायचन्द्र शास्त्रमाला बम्बई का और दूसरा देवकरण शास्त्रमाला उपलब्ध हैं। 'कर्मकाण्ड' में नौ अधिकार हैं- (1) प्रकृति समुत्कीर्तन (2) बन्धोदयसत्व, (3) सत्वस्थानभंग, (4) त्रिचूलिका, (5) स्थान समुत्कीर्तन, (6) प्रत्यय, ( 7 ) भावचूलिका, (8) त्रिकरणचूलिका और (9) कर्मस्थिति रचना | प्रकृति समुत्कीर्तन का अर्थ है - जिसमें आठों कर्मों और उनकी उत्तर प्रकृतियों का कथन हो । अतः 'कर्मकाण्ड' में कर्मों और उनकी विविध अवस्थाओं का कथन है । इस प्रथम अधिकार में यह बतलाते हुए कि जीव और कर्म का सम्बन्ध अनादि है कर्मों के आठ भेदों के नाम, उनका कार्य, उनका क्रम, उनकी उत्तर प्रकृतियों में से कुछ विशेष प्रकृतियों का स्वरूप, बन्धकृतियों, उदयप्रकृतियों और सत्वप्रकृतियों की संख्या में अन्तर का कारण; देशघाती सर्वघाती पुण्य और पाप प्रकृतियाँ; पुद्गलविपाकी, क्षेत्रविपाकी, भवविपाकी और जीवविपाकी प्रकृतियाँ; कर्म में निक्षेप योजना आदि का कथन छियासी गाथाओं में किया गया है। 'बन्धोदय सत्वाधिकार' में कर्मों के बन्ध उदय और सत्व का कथन है। 'सत्वस्थानभंग' प्रकरण में सत्वस्थान का भंगों के साथ कथन है - प्रत्येक गुणस्थान में प्रकृतियों का सत्वस्थान कितने प्रकार से सम्भव है और उसके साथ जीव किस आयु को भोगता है और परभव की किस-किस आयु को बाँधता है। 'त्रिचूलिका अधिकार' में तीन चूलिकाएँ हैं नवप्रश्न चूलिका, पंचभागहार चूलिका और दशकरण चूलिका । नवप्रश्न चूलिका में नौ प्रश्नों का समाधान किया गया है। वे नौ प्रश्न इसप्रकार हैं- (1) उदयव्युच्छित्ति के पहले बन्ध की व्युच्छित्ति किन प्रकृतियों की होती हैं? (2) उदय व्युच्छित्ति के पीछे बन्ध की व्युच्छित्ति किन प्रकृतियों की होती है ? (3) उदय व्युच्छित्ति के साथ बन्ध की व्युच्छित्ति किन प्रकृतियों की होती है ? (4) जिनका अपना उदय होने पर बन्ध हो ऐसी प्रकृतियाँ कौनसी हैं ? (5) जिनका अन्य प्रकृति का उदय होने पर बन्ध हो ऐसी प्रकृतियाँ कौनसी हैं ? (6) जिनका अपना तथा अन्य प्रकृति का उदय होने पर बन्ध हो, वे प्रकृतियाँ कौनसी हैं ? ( 7 ) जिनका निरन्तर बंध होता है ऐसी प्रकृतियाँ कौनसी हैं ? (8) जिनका सान्तरबन्ध होता है अर्थात् कभी बन्ध होता है और कभी नहीं होता, वे प्रकृतियाँ कौनसी हैं ? (9) जिनका निरन्तर बन्ध भी होता है और सान्तरबन्ध भी होता है वे प्रकृतियां कौनसी हैं ? इन नौ प्रश्नों के समाधान भी इस चूलिका में दिए गए हैं।' पंचभागहार चूलिका' में उद्वेलन, विध्यात, अधःप्रवृत्त, गुणसंक्रम और सर्वसंक्रम इन पाँच भागहारों का कथन है। इन भागहारों के द्वारा जीवों के शुभाशुभ कर्म अपने परिणामों के निमित्त से अन्य प्रकृतिरूप परिणमन करते हैं । जैसे शुभ परिणामों का निमित्त
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