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जैनविद्या - 12
प्राप्त कलुषता के रहते हुए किस प्रकार सम्भव है ? इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य कहते हैं- 'काललब्ध्यादिनिमित्तत्वात् ' - काललब्धि आदि के निमित्त से इनका उपशम होता है । अन्य आगम ग्रन्थों में क्षयोपशम लब्धि, विशुद्धि लब्धि, देशनालब्धि, काललब्धि और प्रायोग्यलब्धि ये पाँच लब्धियाँ बतलाई हैं । प्राचार्य पूज्यपाद ने काललब्धि के साथ लगे प्रादि शब्द से जातिस्मरण आदि का निर्देश किया है और काललब्धि के कर्म स्थिति का काललब्धि मौर भवापेक्षया काललब्धियों का निर्देश किया है । यह विषय सर्वथा सैद्धान्तिक और मौलिक है । तृतीय- चतुर्थ अध्याय में लोक का वर्णन किया गया है । ग्रह केन्द्र वृत, ग्रहकक्षाएँ, ग्रहों की गति, चार क्षेत्र आदि चर्चाएँ तिलोयपण्णति के तुल्य हैं । लोकाकार का वर्णन श्राचार्य ने मौलिक रूप में किया है । मौलिक तथ्यों के समावेश की दृष्टि से पंचम अध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण है । द्रव्य, गुण और पर्यायों का स्पष्ट और सम्यक् विवेचन इसमें हुआ है । षष्ठ और सप्तम अध्याय में दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव के कारण केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देवों के प्रवर्णवाद का विस्तृत विवेचन है । सप्तम अध्याय के प्रथम सूत्र में रात्रिभोजनत्याग नामक षष्ठ अणुव्रत की समीक्षा की गई है । इसी अध्याय के त्रयोदश सूत्र के व्याख्यान में प्राचार्य ने हिंसा और अहिंसा के स्वरूप का विवेचन करते हुए उनके समर्थन में अनेक गाथाएँ उद्धृत की हैं । अष्टम अध्याय में कर्मबंध का और कर्मों के भेद-प्रभेदों का वर्णन द्रष्टव्य हैं । प्रथम सूत्र में बंध के पाँच कारण बतलाए हैं । उनकी व्याख्या में पूज्यपाद ने मिथ्यात्व के पाँच भेदों का कथन करते हुए पौरुषाद्वैत एवं श्वेताम्बरीय निर्ग्रथ - सग्रंथ, केवली - केवलाहार तथा स्त्री - मोक्ष सम्बन्धी मान्यताओं को भी विपरीत मिथ्यात्व कहा है । इस अध्याय के अन्य सूत्रों का व्याख्यान भी महत्त्वपूर्ण है । पदों की सार्थकताओं के विवेचन के साथ पारिभाषिक शब्दों के निर्वचन विशेष उल्लेखनीय हैं। नवम अध्याय में संवर, निर्जरा और उनके साधन गुप्ति ग्रादि का विशद विवेचन है। दशम अध्याय में मोक्ष और मुक्त जीवों के ऊर्ध्वगमन का प्रतिपादन है ।
इस समग्र रचना की शैली वर्णनात्मक है। सूत्रों की सार्थक व्याख्या मौलिक और महनीय है । इस कृति में पूज्यपाद देवनन्दि भाष्यकार के समान परिलक्षित हैं । पूज्यपाद के गूढ़, गहन और तलस्पर्शी अध्ययन-अनुभव के अभिदर्शन इस कृति के माध्यम से होते हैं ।
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समाधितंत्र - इस रचना को 'समाधिशतक' भी कहा जाता है। इसमें 105 पद्य हैं । प्रध्यात्म का सुन्दर दिग्दर्शन इसमें हुआ है । इस कृति की विषय-वस्तु का आधेय कुन्दकुन्दाचार्य प्रणीत ग्रंथ है । अनेक पद्य तो रूपान्तर से प्रतीत होते हैं । एक निदर्शन द्रष्टव्य है
यग्राह्म न गृह्णाति गृहीतं नापि मुञ्चति । जानाति सर्वथा सर्वं तत्स्वसंवेद्यमस्म्यहम् ।।
( समाधितंत्र, पद्य 30 )