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जैनविद्या-12
जीवोऽन्यः पुद्गलश्चान्य इत्यसौ तत्त्वसङ्ग्रहः ।
यदन्यदुच्यते किञ्चित् सोऽस्ति तस्यैव विस्तरः ॥ (पद्य-सं. 50) विषय-सुख में लिप्त मनुष्य विषय के तादात्विक सुख की अनुभूति में ही अपने जीवन की सार्थकता का अनुभव करता है। उसके भावी दुःखमय परिणाम का ज्ञान उसे नहीं रहता । संसारी मनुष्य भय-संकट की स्थिति में भी अपने को अज्ञतावश निर्भय समझता है परन्तु वस्तुतः उसकी यह निर्भयता एक प्रकार की मिथ्याकल्पना-मात्र होती है । इसीलिए सही सुख-दुःख को पहचान कर स्व-स्वभाव में आत्मस्थ होने का अविराम प्रयत्न और पुरुषार्थ अपेक्षित है । यही 'इष्टोपदेश' का मूल कथ्य है ।
_ 'दृष्टान्त' की शाब्दिक व्याख्या के अनुसार, परिणाम को प्रदर्शित करनेवाली बातें ही दृष्टान्त हैं—जिसका अन्त या परिणाम देखा गया है, 'दृष्टः अन्तो यस्य स दृष्टान्तः ।' मूलतः दृष्टान्तपरक उपदेशात्मक बातें नीति की बातें हुआ करती हैं । आचार्य देवनन्दी ने 'इष्टोपदेश' में अवश्य ही, दर्शन के आसंग में नीति की बातें कही हैं और नीति के प्रासंग में दर्शन के तत्त्वों की विवेचना की है।
इस प्रकार, 'इष्टोपदेश' में नीति और दर्शन का अपूर्व संगम हुआ है । ।
पी. एन. सिन्हा कालोनी
भिखना पहाड़ी पटना-800006