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________________ जैनविद्या-12 मानता है तथा कोई निमित्त और उपादान दोनों को कार्य का कर्ता मानता है । उक्त दोनों पक्षों का खंडन कर आचार्य कहते हैं एक उपादान स्वयं प्रात्मा ही अपने सुख-दुःख का कारण है । यद्यपि उस समय इष्ट परद्रव्य का संयोग और अनिष्ट परद्रव्य का वियोग-अभाव सुख का कारण, तथा इष्ट परद्रव्य का वियोग और अनिष्ट परद्रव्य का संयोग दुःख का कारण दिखाई देता है तथापि सूक्ष्म तत्त्वदृष्टि से देखा जाय तो सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता । परो ददातीति कुबुद्धिरेषा ॥ __ अपने सुख-दुःख का देनेवाला कोई अन्य इष्ट-अनिष्ट पदार्थ है, इस प्रकार की मान्यता मिथ्या है, वस्तु-सिद्धान्त के विपरीत है । यहां कोई प्रश्न उपस्थित कर सकता है कि केवल उपादान द्रव्य को ही कर्ता मानना, नमित्त को अकिंचित्कर मानना यह मिथ्या एकांत है । प्रागम में तो' –'बाह्य तरोपाधि समग्रतेयं कार्येषु ते द्रव्यगतः स्वभावः ।' बाह्य-निमित्त और पभ्यंतर-उपादान दोनों की समग्रता कार्य की जनक कही है। इसका उत्तर है कि यहां समग्रता शब्द से अभिप्राय है—बाह्य और अभ्यंतर, उपादान और निमित्त इन दोनों की अपने-अपने कारण की समग्रता होने पर कार्य होता है । इस प्रकार दोनों का सांनिध्य-संयोग-सद्भाव मात्र अावश्यक कहा है । तथापि प्राचार्य कहते हैं—निमित्तमभ्यन्तरमूलहेतोः ॥ अर्थात् वस्तु का अभ्यन्तर उपादान कारण ही कार्य का मूल हेतु परमार्थ हेतु रहता है। निमित्तमात्रमन्यत् तु गते धर्मास्तिकायवत् । जो अन्य परद्रव्य निमित्त कारण कहा जाता है वह केवल निमित्त मात्र केवल सद्भाव सूचक है । उपादान की तरह निमित्त उपादान के कार्य में कुछ करे ऐसा नहीं है। जैसाकि जीव-पुद्गल द्रव्य की गति क्रिया में धर्म द्रव्य केवल उदासीन निमित्त कहा जाता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारण से ही होता है। तदनुकूल बाह्य इतर कारणों का सद्भाव सांनिध्य मात्र आवश्यक होता है। निमित्त के संयोग-सांनिध्य के बिना कार्य नहीं होता, परन्तु निमित्त पर द्रव्य उपादान द्रव्य की परिणति क्रिया में कुछ करे, ऐसा नहीं है । सर्वथा अकिंचित्कर है । यहां निमित्त प्रधान व्यवहारनय भाषा से तत्वार्थराजवार्तिक में प्रश्न उपस्थित किया है--निमित्तभूतं परद्रव्यं कथं अकिंचित्करं स्यात् ?" निमित्तभूत परद्रव्य का सद्भाव, संयोग, सांनिध्य आवश्यक होने पर निमित्तभूत परद्रव्य को अकिंचित्कर किस कारण कहा ? ____ उत्तर-कौनमा कार्य किस परद्रव्य के संयोग में, सांनिध्य में होता है ऐसा निमित्त मात्र का ज्ञान कराने के लिए निमित्तभूत परद्रव्य का संयोग आवश्यक कहा । परन्तु उपादान
SR No.524760
Book TitleJain Vidya 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1991
Total Pages114
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size10 MB
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