SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 120
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ जैन विद्या ( यद्यपि ) ( आपकी ) शोभा खूब प्रकाशित है, तो भी क्या प्रकाशपूर्ण सूर्य दीपक से नहीं पूजा जाता है ? 1:14 वीतराग होने के कारण तुम्हारी ( स्वयं की पूजा से (तुमको ) हर्ष नहीं ( होता है ) तथा शान्त हुए वैर के कारण ( तुम्हारी) निंदा से (तुमको) कोध नहीं ( आता है ) । हे देव ! भली प्रकार से उच्चारण किया हुआ तुम्हारा नाम ( ही ) (और) ( वह) सुख का धाम ( है ) ; ( वह) मेरे चित्त को पवित्र करे । श्रेष्ठ (है) तुमको पूजते हुए मनुष्य वर्ग की महा पुण्यराशि को ( पूजा सामग्री से यह पाप-युक्तकरण दूषित करने के लिए समर्थ नहीं होता है, जिस प्रकार घातक प्रशस्त करण अमृत के सागर को ( दूषित करने के लिए समर्थ नहीं होता है ) । हे देव ! तुम्हारे द्वारा विघ्नरहित, श्रेष्ठ (व) जानेवाले भव्यों के लिए ( समझाया गया है ) । हे देव ! प्रासक्तिरूपी कालसर्प द्वारा भक्षित ( मनुष्य ) ( तुम्हारी गया ( है ) । ) उत्पन्न ) विष का समग्र मार्ग त्रिलोक के अग्र भाग पर पतित होता हुआ मनुष्य ( तथा ) वाणीरूपी अमृत से शुद्ध किया हे स्वामी ! आपके द्वारा संसाररूपी सागर का किनारा पा लिया गया ( है ) ( श्रौर), आपके द्वारा सम्पूर्ण विद्यारूपी शरीर ( भी ) पा लिया गया ( है ) । आप में पूर्णतः प्रकट हुई ज्ञानज्योति से चन्द्र (और) सूर्य का यह तेज प्रकाशित हुआ ( है ) । अनसमझ बालक मुख के प्रतिबिम्ब को दर्पण में ( ऐसा ) मानते हैं । हे नाथ ! उसी प्रकार अहंकारबुद्धि से देखते हुए लालायित (यह ) मुख ही ( है ), हुए अज्ञानी (लोग) ( एकांगी) वस्तु स्वरूप को (जो ) बतलाते ( हैं ), ( उसे) (ही) वे (वस्तु का ) स्वरूप ( कह देते हैं) । हे नाथ ! आपका ध्यान करते हुए होने के कारण मेरा मन ज्ञान में लौन होवे ( श्रौर) संकल्प - रहित ( हो जाय ) । मरणभएणं लुक्कइ श्रहव न चुक्कइ वंछइ सिवसुहु नउ लहइ । हवि हु माणुस भयकामहु वसु सहियए तप्पिवि तणु डहइ ॥ 2.6 ( अ ) = मरणभएणं [ ( मरण) - (भन ) 3 / 1] लुक्कइ ( लुक्क) व 3 / 1 अक ग्रहव तब चुक्कइ (चुक्क) व 3 / 1 अक न ( अ ) = नहीं बंछइ ( वंछ ) व 3 / 1 सक सिवसुहु [ (सिव) - ( सुह ) 2 / 1] नउ ( अ ) = नहीं लहइ ( लह) व 3 / 1 सक तहवि ( अ ) = फिर भी हु ( अ ) = श्राश्चर्य माणुसपसु [ ( माणुस ) - ( पसु ) 1 / 1] भयका महु [ (भय) - (काम) 6/1] वसु ( वस) 1 / 1 सहियए ( स - हियत्र) 7 / 1 तप्पिवि ( तप्प ) संकृ तणु ( तण ) 2 / 1 डहइ (डह ) व 3 / 1सक ।
SR No.524755
Book TitleJain Vidya 05 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPravinchandra Jain & Others
PublisherJain Vidya Samsthan
Publication Year1987
Total Pages158
LanguageSanskrit, Prakrit, Hindi
ClassificationMagazine, India_Jain Vidya, & India
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy