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________________ नैयायिकों ने इन्हीं में दो रूप-अबाधित विषयत्व तथा असत्प्रतिपक्षत्व और जोड़कर हेतु के पांच रूप माने हैं । इन पांचों रूपों के द्वारा असिद्ध आदि पांच हेत्वाभासों का निराकरण हो जाता है। किन्तु जैन न्याय में हेतु का केवल एक रूप ही माना गया है, वह है अन्यथानुपपत्ति। जहां अन्यथानुपपत्ति है वहाँ तीन अथवा पाँच रूपों की कोई आवश्यकता नहीं है और जहाँ अन्यथानुपपत्ति नहीं है वहाँ तीन रूप अथवा पाँच रूप भी व्यर्थ हैं। इस विषय में स्वामी पात्रकेसरी ने 'विलक्षणकदर्शन' ग्रन्थ में कितना सुन्दर कहा है अन्यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् । नान्यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् ।। अन्यथानुपपन्नत्वं यत्र कि तत्र पञ्चभिः। नान्यथानुपपन्नत्वं यत्र किं तत्र पञ्चभिः ।। "उदेष्यति शकटं कत्तिकोदयात्' इस अनुमान में हेतु में पक्षधर्मत्व नहीं है फिर भी अन्यथानुपपत्ति के होने से कृतिकोदय हेतु शकटोदय साध्य का गमक होता है। इसके विपरीत 'गर्भस्थः मैत्रतनयः श्यामः तत्पुत्रत्वात् इतरपुत्रवत्' इस अमुमान में हेतु रूप्य के रहने पर भी अन्यथानुपपत्ति के न होने से तत्पुत्रत्व हेतु श्यामत्व साध्य का गमक नहीं होता है। हेतु के भेव जैन न्याय में हेतु के कई भेद किये गये हैं। सर्व प्रथम हेतु के दो भेद होते हैंउपलब्धिरूप हेतु और अनुपलब्धिरूप हेतु । उपलब्धिरूप हेतु विधि तथा प्रतिषेध दोनों का साधक होता है तथा अनुपलब्धिरूप हेतु भी दोनों का साधक होता है। विधिसाधक अविरुद्धोपलब्धि छः प्रकार की है। प्रतिषेध साधक विरुद्धोपलब्धि भी छः प्रकार की है। प्रतिषेध साधक अविरुद्धानुपलब्धि सात प्रकार की है और विधिसाधक विरुद्धानुपलब्धि तीन प्रकार की है । विस्तार के भय से यहाँ इन के उदाहरण नहीं दिये गये हैं। इन्हें जानने के लिए परीक्षामुख सूत्र देखना चाहिए। हेत्वाभास _ अनुमान के प्रकरण में हेत्वाभास का ज्ञान भी आवश्यक है । जो हेतु के लक्षण से रहित हो, किन्तु हेतु जैसा मालूम पड़ता हो, वह हेत्वाभास कहलाता है। बौद्ध हेतु के तीन रूप मानते हैं, इसलिए उन्होंने तीन रूपों के अभाव में क्रमशः तीन हेत्वाभास माने हैंअसिद्ध, विरुद्ध और अनेकान्तिक । नैयायिकों ने हेतु के पाँच रूप माने हैं, इसलिए उन्होंने पांच रूपों के अभाव में पांच हेत्वाभास माने हैं—पूर्वोक्त तीन तथा कालात्यापदिष्ट (बाधित) और प्रकरणसम (सत्प्रतिपक्ष) __ जैन न्याय में हेतु का एक ही रूप माना गया है इसलिए उसके अभाव में एक ही हत्वाभास होना चाहिए था, किन्तु यहाँ चार हेत्वाभास माने गये हैं। इस विषय में अकलङ्क 1. हेतुलक्षणरहिता हेतुवदवभासमाना हेत्वाभासाः । २०८ तुलसी प्रज्ञा Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524516
Book TitleTulsi Prajna 1978 10
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNathmal Tatia
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1978
Total Pages78
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Tulsi Prajna, & India
File Size5 MB
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