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प्रथम अंश
कालद्रव्य प्रभावक नहीं
आचार्य श्री विद्यासागर जी
विद्वानों के विनम्र अनुरोध पर उनकी महत्त्वपूर्ण जिज्ञासाओं के समाधान हेतु परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की स्वीकृति पाकर श्री सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर ( दमोह, म०प्र०) में दि० १४ मई २००७ से १६ मई २००७ तक प्रथम श्रुताराधना शिविर आयोजित हुआ था। उसमें आचार्यश्री ने प्रतिदिन पूर्वाह्न और अपराह्न में दो-दो घंटे चार विषयों पर पाँच प्रवचन किये थे, जो अत्यन्त शोधपूर्ण, हृदयस्पर्शी और अज्ञानान्धकार- विनाशक थे।
पहले दिन दोनों प्रवचनों का विषय कालद्रव्य था । आचार्यश्री ने उद्घोष किया कि द्रव्यों के परिणमन में काल- द्रव्य मात्र उदासीन निमित्त होता है, प्रभावक या उत्प्रेरक नहीं होता। अर्थात् वह जीवों के उपादान में कोई अच्छा-बुरा परिवर्तन नहीं करता, न उनके कार्य में कोई बाधा या सुविधा उपस्थित करता है, न ही उनके पौरुष या शुभाशुभ कर्मों के उदय को प्रेरित करता है, अपितु उपादान जैसा होता है, उसी रूप में उसके परिणमन में सहायक होता है । शीतग्रीष्मादिकाल-निमित्तक साता असातावेदनीय का उदय वस्तुतः पुद्गल की शीतादिपर्याय के निमित्त से होता है, साहचर्य के कारण काल पर उसके उदयनिमित्तत्व का आरोप किया जाता है इसी प्रकार अधिकरणभूत जिस काल में शुभाशुभ फलदायक शुभाशुभ कर्म का उदय होता है, उस काल पर शुभाशुभत्व का आरोप किया जाता है। अतः सम्यक्त्व और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किसी कालविशेष की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि आत्मोपादान को ही सम्यक्त्व और मोक्ष की प्राप्ति के योग्य बनाने का पौरुष करना चाहिए। आत्मपौरुष से जिस काल में आत्मोपादान सम्यक्त्व या मोक्ष की प्राप्ति के योग्य बन जाता है, वही काल काललब्धि संज्ञा पा लेता है। इसी कारण आगम में काल को हेय कहा गया है।
( रतनचन्द्र जैन ) सम्पादक
बारे में भी हम थोड़ा-बहुत सोचते हैं, तो इस दिशा में उनका जो पुरुषार्थ है, वह नगण्य प्रतीत होता है। काल के विषय में जैनदर्शन ने जो चिन्तन दिया है. वह अद्भुत है। वह कभी समय के अनुसार परिवर्तित नहीं होता।
कुछ द्रव्य ऐसे होते हैं जो अपना प्रभाव तो रखते हैं, लेकिन सामने नहीं रहते। कुछ द्रव्य ऐसे हैं जो सामने तो रहते हैं, किन्तु प्रभावक नहीं होते। प्रत्येक कार्य जब कभी होता है, तो उसमें काल निमित्त अवश्य पड़ता है लेकिन वह प्रभावक नही होता है, ऐसा हम समझते हैं। इस प्रकार की बात कह करके शायद हम कई लोगों की धारणायें कुण्ठित कर रहे हैं।
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काल द्रव्य अवश्य है, लेकिन वह प्रभावक नहीं है प्रभावक का अर्थ है 'प्रकर्षरूपेण भावं उत्पादयति इति प्रभावकः प्रकर्ष रूप से जो भाव उत्पन्न करा दे उसे प्रभावक कहते हैं। जब हम चेतन द्रव्य की ओर देखते हैं, तो हम उसको प्रभावक नहीं कह सकते हैं, तो फिर हम काल द्रव्य को कैसे प्रभावक कहें, तथापि हम उसको हमेशा आरोप के लिए पात्र चुन लेते हैं । काल पर यह आरोप ठीक नहीं है। आज विज्ञान का युग है। विज्ञान में भी काल को साधन माना गया है परन्तु वैज्ञानिक किस रूप में सफल हुए हैं, इसके
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'निष्क्रियाणि च' (त. सू. ५ / ७) यह सूत्र आता है । काल निमित्त बनता है। भावों की उत्पत्ति में जैनदर्शन ने इसे निमित्त के रूप में स्वीकार किया है, प्रभावक के रूप में कभी स्वीकार नहीं किया है 'युक्त्यनुशासन' की कारिका में 'वा' शब्द दिया है, वह बड़ा महत्त्वपूर्ण है। वह 'वा' शब्द इतना अर्थगाम्भीर्य रखता है कि वह समन्तभद्र स्वामी के अनेकान्त को सामने लाकर रख देता है । 'कालः कलिर्वा' 'वा' यही जैनदर्शन में बताया है और इसी बात का चित्रण इस कारिका में समन्तभद्र महाराज जी ने किया है। इसलिए अब हमें किसी भी प्रकार से काल को प्रभावक नहीं बनाना है। काल को जब से हमने प्रभावक के रूप में, उत्प्रेरक के रूप
अप्रैल 2009 जिनभाषित 7
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