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________________ यत्न होना चाहिये। उनकी प्राप्ति में वस्तुतः कोई नीच कही यस्यास्ति सम्यक्त्वमसौ कुलीनो जानेवाली जाति बाधक नहीं है। यस्यास्ति सम्यक्त्वमसौ न दीनः॥७७॥ गुणैः सम्पद्यते जातिगुणध्वंसैर्विपद्यते। अर्थात् जो मनुष्य सम्यक्त्व गुण का धारक है वह यतस्ततो बुधैः कार्यों गुणेष्वेवादरः परः॥३२॥ | अत्यंत चतुर है, श्रेष्ठ है, कुलीन है और अदीन है। जातिमात्रमदः कार्यो न नीचत्वप्रवेशकः। भावार्थ- जैन धर्म के अनुसार नीच से नीच जाति का उच्चत्वदायकः सद्भिः कार्यः शीलसमादरः॥३३॥ | मनुष्य भी सम्यक्त्व गुण को धारण कर सकता है-एक उत्तम गुणों से ही उत्तम जाति बनती है और उत्तम | चाण्डाल का पुत्र भी सम्यग्दृष्टि हो सकता है। स्वामी समन्तभद्र गुणों के नाश से वह जाति नष्ट हो जाती है-नीचत्व को प्राप्त | ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में ऐसे चाण्डाल पुत्र को 'देव' हो जाती है। इसलिये बुद्धिमानों को सबसे अधिक गुणों का | लिखा है-आराध्य बतलाया है। अतः ऐसे सम्यग्दर्शन प्राप्त ही आदर करना चाहिये (बाह्य जाति पर दृष्टि रखकर या नीच जाति के पुरुषों को भी अमितगति आचार श्रेष्ठ कुलीन उसके भुलावे में भूल कर उसी को सब कुछ न समझ लेना | और अदीन लिखते हैं। यह है गुणों का आदर-भाव, गुणों के चाहिये)। साथ ही, अपनी जाति का कभी मद नहीं करना | अविर्भाव की सद्भावना और सद्प्रेरणा। चाहिये। (अपनी जाति को ऊँचा और दूसरों की जाति को आचार्य महोदय के इन सब उदगारों पर अधिक नीचा समझने रूप) यह मद आत्मा में नीचत्व का प्रवेश | टीका टिप्पणी की जरूरत नहीं-वे इन जाति भेदों को किस करने वाला है-उसे नीचे गिराने वाला अथवा नीच बनाने दृष्टि से देखते थे और उन्हें क्या महत्त्व देते थे यह सब ऊपर वाला है। उच्चत्व का देने वाला-आत्मा को ऊपर उठानेवाला- | के कथन से बिल्कुल स्पष्ट है। और इसलिये जो समान शीलसंयमादि गुणों के प्रति आदर भाव है-भले ही उन गुणों | वर्ण, समान धर्म, और समान गण-शील वाली उपजातियों में का प्रादुर्भाव किसी नीच जाति के व्यक्ति में ही क्यों न हुआ | भी अनुचित भेदभाव की कल्पना किये हये हैं-परस्पर में हो-और इसलिये सत्पुरूषों को उसी आदर भाव से काम | रोटी बेटी का संबंध एक करते हुये हिचकिचाते हैं-उन्हें लेना चाहिये-जाति भेद के चक्कर में पड़ कर गुणियों अथवा | आचार्य महाराज के इन उद्गारों से जरूर कुछ शिक्षा ग्रहण गुणों का तिरस्कार नहीं करने देना चाहिये। करनी चाहिये और उस कदाग्रह को छोड़ देना चाहिये, जो भावार्थ- इन ब्राह्मणादिक जातियों का बनना और | धर्म तथा समाज की उन्नति में बाधक है। जो लोग कदाग्रह बिगड़ना सब गुणों पर ही मुख्य आधार रखता है-उनका को छोडकर अंतर्जातीय विवाह करने लगे हैं उनकी यह मूल जन्म नहीं, किन्तु गुण समुदाय है। गुणों के आविर्भाव से | उदार तथा विवेक परिणति नि:संदेह प्रशंसनीय और एक नीच जाति वाला उच्च जाति का और गुणों के अभाव से | अभिनंदनीय है। एक उच्च जातिवाला नीच जाति का व्यक्ति बन जाता है 'अनेकान्त' वर्ष १/किरण २ किसी की जाति अटल या शाश्वती नहीं है-अटल है तो वीर निर्वाण सं. २४५६ से साभार एक मनुष्य जाति है जो जीवनभर तक छट नहीं सकती. | सन्दर्भ उसी पर पूरा लक्ष्य रखना चाहिये। इसलिये महज जन्म की १. आशाधरजी के उस कथन का एक वाक्य इस प्रकार है - अनादाविह संसारे दुर्वार मकरध्वजे। वजह से दूसरों के व्यक्तित्व का तिरस्कार करना उचित कुले च कामिनीमूले का जातिपरिकल्पना॥ नहीं-उचित है दूसरों के गुणों का आदर करना, उनमें गुणों | २. यह १७५ पृष्ठ की पुस्तक छह आने मूल्य में ला. जौहरीमल जी के अविर्भाव की भावना रखना और उसका सब ओर से | जैन सराफ़. दरीबा कलाँ देहली के पास मिलती है। प्रत्यन करना, यही दोनों के लिये उत्कर्ष का साधक है।। ३. यह 'देव' का 'आराध्य' अर्थ प्रभाचन्द्र आचार्य ने रत्नकरण्डइसी से आचार्य महोदय ग्रन्थ के अंतिम भाग में लिखते हैं: श्रावकाचार की टीका में दिया है। यस्यास्ति सम्यक्त्वमसौ पटिष्ठो यस्यास्ति सम्यक्त्वमसौ वरिष्ठः। ढूँढता फिरता हूँ अय इकबाल अपने आपको, आप ही गोया मुसाफिर, आप ही मंजिल हूँ मैं। इकबाल -मार्च 2007 जिनभाषित 25 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.524315
Book TitleJinabhashita 2007 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Jain
PublisherSarvoday Jain Vidyapith Agra
Publication Year2007
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Jinabhashita, & India
File Size5 MB
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