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मुनिश्री क्षमासागर जी
की कविताएँ
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एक पेड़ तुम उगाओ एक मैं, जब दोनों बड़े हो जाएँगे, संसृति के क्रम को वे ही दुहराएँगे।
लिखना-पढ़ना लिख लेता हूँ पढ़ लेता हूँ जो कहा जा सकता है उसे कह भी लेता हूँ। यदि लिखना-पढ़ना और कुछ कह लेना ही जीना है, तो इतना मैं भी जी लेता हूँ।
दूसरा दिन रोज लगता है जैसे कुछ छूट गया हो, करने को कहने को रह गया हो, शायद दो दिन की जिंदगी में इसीलिए दूसरा दिन होता हो।
आघात आँधी आकर चली गई है, वृक्ष शोकाकुल शान्त खड़े हैं, उनके बावजूद भी चिड़ियों के घोंसले टूटकर गिर पड़े हैं। क्या अब कोई चिड़िया विश्वास से भरकर नया घोंसला बना पाएगी?
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